शीतला अष्टमी का व्रत आषाढ़ मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाएगा। इस दौरान घर-घर माता शीतला की पूजा की जाएगी। स्कंदपुराण के अनुसार 12 महीने शीतला अष्टमी के व्रत का विधान है। सामान्यतया महिलाएं व्रत रखती हैं और बासी भोजन करने का विधान है। इस दिन गृहणी घर में गैस का चूल्हा जलाकर भोजन या भोग नहीं बनाती हैं, यह कार्य व्रत के एक दिन पूर्व सप्तमी के दिन ही रात में किया जाता है।
ज्योतिषाचार्य विमल जैन ने बताया कि आषाढ़ मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि एक जुलाई को दिन में 2:02 पर लगेगी। यह अगले दिन दो जुलाई शुक्रवार को दिन में 3:29 तक रहेगी। जिसके फलस्वरूप दो जुलाई शुक्रवार को शीतला अष्टमी के व्रत का पर्व मनाया जाएगा। शीतला माता को दिगंबरा बतलाया गया है। यह गर्दभ पर आसीन रहती हैं, सूप मार्जनी (झाड़ू) और नीम के पत्तों से अलंकृत रहती हैं। इनके हाथ में शीतल जल से पूर्व कलश रहता है। नीम के पत्तों से पालन करने पर शारीरिक कष्टों की निवृत्त होती है। रोगी के समीप जल से युक्त कलश एवं नीम की पत्तियां रखी जाती हैं।
शीतला माता को की पूजा के लिए तिथि विशेष पर घी और शक्कर मिली हुई खीर का ही भोग अर्पित किया जाता है। इसके अतिरिक्त परिवार के लिए भी और परंपरा के अनुसार अन्य चीजें मिष्ठान आदि भी शीतला माता को अर्पित करते हैं। बीमारी, नेत्र, रोग, ज्वर, बुखार, चेचक एवं अन्य बीमारियां जिसमें शरीर पर छोटे-बड़े फोड़े फुंसी आदि दूर हो जाते हैं। शीतला स्तोत्र शीतला जी की अन्य पारंपरिक लोकगीत एवं स्थितियां शीतला जी की महिमा में गाई जाती हैं। व्रत करता को दिन में शयन नहीं करना चाहिए। अनर्गल वार्तालाप एवं हास परिहास से बचना चाहिए। अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए, रात्रि में शीतला माता की पूजा करके घर में दीपक जलाना चाहिए।