पिगंल संवत्सर के मंत्री शनिदेव की जयंती छह जून को रोहिणी नक्षत्र और धृति योग में मनाई जाएगी। ज्योतिष शास्त्रों में शनिदेव को मंदगामी, सूर्य पुत्र, शनिश्चर, छायापुत्र आदि नाम से जाना जाता है। ज्योतिष विमल जैन के अनुसार ज्येष्ठ मास कृष्णपक्ष की अमावस्या तिथि पांच जून को शाम 7:56 बजे से अगले दिन छह जून को शाम 6:08 बजे तक रहेगी। रोहिणी नक्षत्र पांच को रात 9:17 बजे से अगले दिन रात 8:17 बजे तक रहेगा। काशी में विश्वनाथ मंदिर के पास, मंगला गौरी मंदिर, बाबा कालभैरव, केदारेश्वर मंदिर, संकठा मंदिर सहित और कई मंदिरों में शनिदेव के विग्रह मौजूद हैं।
शनि भगवान शनि स्तोत्र, शनि चालीसा का पाठ, आरती करें। काले उड़द के दाल की खिचड़ी गरीबों में वितरित व काले रंग की वस्तुओं का दान करें। ओम शं शनैश्चराय नम:, ओम प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:, ओम प्रां प्रीं प्रौं सं शनैश्चराय नम:, ओम नमो भगवते शनैश्चराय सूर्यपुत्राय नम:, ओम ऐं ह्रीं श्रीं शनैश्चराय नम: मंत्र का जप करना चाहिए। जयंती से एक दिन पहले सरसों के तेल में काला तिल डालकर शमी के वृक्ष के पास रख दें और उसे शनि जयंती पर उसी तेल से दीपक जलाएं। इससे सभी बाधाएं दूर होंगी। शनि जयंती पर कौवों को रोटी खिलाना चाहिए। क्योंकि, कौवा सूर्यपुत्र के वाहन हैं।
शनि कुंभ राशि में विराजमान है, जिसके चलते कर्क, वृश्चिक राशि वालों को शनि ग्रह की अढ़ैया और मकर, कुंभ और मीन राशि वालों पर शनि की साढ़े साती का प्रभाव है। जिनकी जन्मकुंडली में इनका प्रभाव हो तो वह शनि जयंती पर व्रत रखकर पूजन-अर्चन करें तो इससे निदान होगा। शनि जयंती पर काले कपड़े में कपूर बांधकर अपने घर की छत के दरवाजे पर टांग दें। सूर्यास्त होने पर उसे जला दें। ऐसा करने से राहु का खराब प्रभाव और कुंडली से शनि दोष भी दूर होता है, मगर इसे करते समय इसपर किसी की नजर न पड़े।