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गंगा में सीधे गिर रहा सीवेज, आचमन करने से बच रहे श्रद्धालु

Sun, 25 Feb 2018 01:56 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला,वाराणसी
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ललिता घाट पर ऐसा है नजारा - फोटो : अमर उजाला
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वाराणसी में आदिकेशव से मणिकर्णिका घाट तक की यात्रा के बाद जब हम जलासेन घाट से होते हुए ललिता घाट पहुंचे तो सदानीरा गंगा का जल काला नजर आया। जलासेन घाट पर गिर रहा नाले का पानी सीधे गंगा में जा रहा है। घाट पर नाले और सीवर के पानी के साथ ही श्रद्धालुओं द्वारा छोड़े गए माला-फूल और कपड़े गंगा जल में तैर रहे हैं।
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ललिता घाट के जल से ही बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक किया जाता है। यह परंपरा आज भी जारी है। नेपाल से आने वाले श्रद्धालु पुरखों को तारने और पुण्य की कामना से इसी घाट पर आचमन और स्नान करते हैं। गंगा में गंदगी और इससे आने वाली बदबू के कारण नेपाली श्रद्धालु किसी तरह आचमन और स्नान की औपचारिकताएं पूरी करते हैं।  

नेपाली साम्राज्य के कला व वैभव के प्रतीक स्वरूप निर्मित ललिता घाट के किनारे टूटी हुई सीढ़ियां, गंदगी और बदबू से हर व्यक्ति को दो-चार होना पड़ रहा है। ललिता घाट पर ही पशुपालक जानवरों को बेरोकटोक स्नान कराते हैं।
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नेपाल के पोखरा से आए रामबहादुर थापा ने बताया कि वह अपने पुरखों की आत्मा की शांति के लिए ललिता घाट पर पूजन करने आए हैं। 35 साल से बनारस आ रहे हैं लेकिन इस बार तो गंगा में बिना स्नान किए ही वापस लौट रहे हैं। काठमांडू के शंखू रिजाल ने बताया कि पहले हम लोग जब आते थे तो गंगा स्नान और आचमन जरूर करते थे लेकिन गंगा में गंदगी और बदबू बढ़ने के कारण आचमन तो दूर स्नान करना भी मुश्किल हो गया है। 

घाट पर स्थित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट काफी समय से खराब चल रहा है। यहां ताला बंद है। परिणाम, सीवेज और गंदगी सीधे गंगा में ही जा रही है। यही नहीं, घाट पर छोटे-छोटे पाइपों के माध्यम से घाट पर रहने वालों के घरों का गंदा पानी सीधे गंगा में ही समाहित हो रहा है। बाहर से आने वाले श्रद्धालु भी माला-फूल और नैवेद्य घाट किनारे या गंगा में छोड़ देते हैं।   

काशी में कर सकते हैं पशुपतिनाथ के दर्शन

पशुपति नाथ मंदिर के व्यवस्थापक रोहित - फोटो : अमर उजाला
काशी के ललिता घाट स्थित पशुपति नाथ मंदिर के व्यवस्थापक रोहित ने बताया कि घाट पर स्थित मंदिरों को नेपाल के राजा राणा बहादुर शाह ने अपनी तीन रानियों ललित त्रिप सुंदरी, राजराजेश्वरी और साम्राज्येश्वरी के लिए बनवाया था। मां भगवती के स्वरूप मां राजराजेश्वरी और नौ गौरी का स्वरूप ललिता गौरी का मंदिर यहां स्थित है।

नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर के स्वरूप में पशुपतिनाथ का मंदिर भी है। पशुपतिनाथ के मंदिर के दर्शन से सर्व देवों के दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है। जो नेपाल जाकर भगवान पशुपति का दर्शन नहीं कर सकते हैं उन्हें ललिता घाट स्थित पशुपति नाथ के दर्शन कर पुण्यलाभ कर सकते हैं। मंदिर और नेपाली धर्मशाला में नेपाल की काष्ठकला का अद्भुत दर्शन किया जा सकता है।

रोहित ने कहा कि गंगा का जल धीरे-धीरे काला पड़ने लगा है। कुछ महीने तो लोगों ने सफाई के प्रति जागरूकता दिखाई लेकिन अब लापरवाही शुरू हो गई है। गंगा अगर नहीं रहेंगी तो हमारा धर्म, संस्कृति और समाज नष्ट हो जाएगा।

जीवनदायिनी गंगा से मोक्ष की कामना तो सभी करते हैं लेकिन वर्तमान में जो हालत है हमें गंगा के निर्मलीकरण के लिए आगे आना होगा। आम लोग जब इस अभियान से जुड़ेंगे तो गंगा के निर्मलीकरण में कोई समस्या नहीं आ सकती है।

श्री अन्नपूर्णा मठ मंदिर के महंत रामेश्वर पुरी ने कहा कि मां गंगा की दशा देखकर मन में असंतोष होता है। जिस देश में जीवनदायिनी, गंगा स्नान और पान से रोग दूर होते थे, उसकी हालत दयनीय हो गई है। बांध और कम जल होने के कारण प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है।

सरकारी की तरफ से घोषणाएं तो होती हैं लेकिन मूर्त रूप नहीं ले पाती हैं। जिस तरह से सनातन धर्म की रक्षा के लिए आदि शंकराचार्य ने सर्व समाज का आह्वान किया था, उसी प्रकार गंगा की रक्षा के लिए समाज के हर व्यक्ति को आगे आना होगा।

सरकार पर दबाव बनाना होगा कि गंगा का प्रवाह अविरल हो सके और गंदगी व प्रदूषण कम हो सके। हम लोग ललिता घाट पर आरती के माध्यम से लोगों को गंगा के प्रति जागरूक कर रहे हैं। 
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चार स्वयंसेवी संगठनों पर हर महीने खर्च हो रहे 25 लाख

जलस्तर में कमी से सामनेघाट के पास मध्य धारा में भी जगह जगह रेत के टीले उभर आये हैं - फोटो : अमर उजाला

गंगा सफाई और जागरूकता के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार की ओर से हर महीने 25 लाख रुपये खर्च किए जा रहे हैं। फिर भी न तो घाटों पर गंदगी रुक रही है, न ही गंगा में कचरा फेंकना रुका है। गंगा में गंदगी फैलने से रोकने और लोगों को जागरूक करने के लिए नगर निगम ने चार स्वयंसेवी संगठन लगाए हैं।

इन संगठनों को छह जोन में बांटकर जागरूक करने की जिम्मेदारी दी गई है। नगर निगम ने घाटों की सफाई की जिम्मेदारी आईएलएफएस को दी है। तीन साल के लिए लगभग 25 करोड़ की धनराशि संस्था को दी गई है। इसके बाद भी घाटों पर छुट्टा पशु घूमते रहते हैं। गोबर फैला रहता है।
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