अमिताभ भट्टाचार्य, वरिष्ठ पत्रकार
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25 साल पहले बाबा कितने भी दूर हों, बड़े नजदीक लगते थे और कुछ ही मिनट में ही उनके दर्शन पा जाता था। न लाइन और न पुलिसिया झंझट। गर्भगृह में बैठकर उन्हें आराम से जल अर्पित करना, चंदन, पूजा नैवेद्य अर्पित कर शिव चालीसा भी पढ़ लेते थे। यह वही समय था जब बनारस बॉलीवुड के रूपहले पर्दे पर उभरा और हर साल रिलीज होने वाली कोई न कोई फिल्म बनारस में जरूर बनती थी।
विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत पं. राम शंकर त्रिपाठी के बेटे रति शंकर त्रिपाठी ने साल 2001-02 में बॉलीवुड में प्रवेश लिया, फिर उनके एवज अब तक काशी में 10 भाषाओं की 100 से ज्यादा फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। हिंदी के अलावा बांग्ला, मलयालम, तमिल, तेलुगु और अंग्रेजी फिल्में भी यहां बनीं। 200 से ज्यादा देसी-विदेशी डॉक्यूमेंट्री शूट हो गईं। 25 साल पहले मैं चौसट्ठी घाट से गंगा के दर्शन करते हुए दशाश्वमेध घाट पर अपने अखबार के ऑफिस में आता था, तब गलियों में ही अतुल्य बनारस के दर्शन हो जाते थे। तत्कालीन विधायक श्यामदेव राय चौधरी गलियों में बिना किसी महामारी के खुद ही टहलकर बीमारों और गरीबों को राशन बांटते दिख जाते थे।
जब मैं कभी कचौड़ी गली की ओर मुड़ गया तो वहां मिलने वाला हर व्यक्ति गर्भगृह से ही बाबा का त्रिपुंड लगवाकर कचौड़ी का लुत्फ उठाने जुट जाता था। शिवरात्रि, रंग भरी एकादशी और सावन सोमवार को छोड़कर कभी भी लाइन में नहीं लगा। तब मंदिर के साथ प्रोटोकॉल जैसा शब्द भी नहीं जुड़ा था। साल के 350 दिनों तक मंदिर में इक्का-दुक्का ही पुलिस फोर्स देखी। तब वह बनारस आधुनिक नहीं था बल्कि वह ''जाए दा'' की थीम पर जीता था। एकर अर्थ ई होई कि जिया और सबके जीये दा। बनारस का ये विचित्र चरित्र 25 साल पहले ही समाप्त हो गया। अक्खड़ काशीवासी घर से निकले तो रिक्शा और टेंपों पकड़कर दो रुपये में गौदोलिया से बीएचयू पहुंच जाते थे और अक्लमंद पर्यटक टांगे पर 20 रुपया देकर गौदोलिया से बीएचयू, दुर्गाकुंड और संकट मोचन तक दर्शन करते थे।
-अमिताभ भट्टाचार्य, वरिष्ठ पत्रकार