एक दौर था जब सावन में झूला और मेहंदी की चर्चाएं सबसे ज्यादा हुआ करती थी। मुझे भी अपने बचपन का सावन याद है। हमारे घर के बाहर की बाउंड्री मेहंदी की झाड़ियों से ही बनी हुई थी। मेहंदी की झाड़ या कहे छोटा पेड़ हर घर के बाहर बाउंड्री वॉल के तौर पर आम दिख जाती थी। सावन में उसी में से पत्ते तोड़कर अक्सर लड़कियां मेहंदी लगाती थीं। पत्तियां तोड़ने का काम घर के छोटे लड़कों को भी करना पड़ता था। मां-बहन के लिए बच्चे खुशी-खुशी यह काम करते थे।
मेहंदी की पत्तियों को पीसकर हाथों पर लगाया जाता था। मेहंदी पिसती थी सिलबट्टे पर। वही सिलबट्टा जिस पर चटनी भी पीसी जाती थी पुदीने की, धनिया की जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक भी होती थी। सील भट्टे पर पीसी मेहंदी का रंग काफी दिनों तक हाथों पर रहता था। पीसने के बाद जो निखार मेहंदी में आता था, वह लड़कियों के चेहरों पर भी दिखता था। माना जाता था कि जिसके हाथ की मेहंदी का रंग जितना गहरा होगा, उतना ही प्यार करने वाला पति लड़की को मिलेगा। समय बदला चीजें बदली घर की चीजें विदा होने लगी। सावन की वो खुशियां, हाथों पर मेहंदी के वो बेल बूटे सजाना, सखियों के हाथों में लगी मेहंदी को कहना कि मेरे हाथों की तुमसे ज्यादा अच्छी है। सिलबट्टा किनारे हुआ, सिलबट्टे वाली चटनी विदा हुई। प्राकृतिक मेहंदी विदा हुई, सहज सरल रिश्तों में गर्माहट कम होने लगी। प्राकृतिक मेहंदी की जगह कृत्रिम मेहंदी आई, वैसे ही रिश्ते भी कृत्रिम होने लगे। अब बाजार से आधुनिक मेहंदी घर आने लगी है। इसका रंग महज तीन-चार दिन में उतर जाता है। रिश्ते भी आजकल ऐसे ही हो गए हैं।
इधर चंद दिनों में नई मेहंदी के रंग उड़ने लगे हैं उधर चंद दिन में प्यार के रिश्ते रंगत खोने लगे हैं। पहले परिवार का दायरा काफी बड़ा था। इस परिवार में सिर्फ रिश्तेदार ही नहीं पड़ोसी भी हुआ करते थे। - डॉ. मधु साहनी, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापिका, गोपी राधा बालिका इंटर कॉलेज