संकटमोचन संगीत महाकुंभ का अंतिम चरण पखावज, बांसुरी को समर्पित रहा। डा. वेंकटेश्वर राव के पखावज ने संकट मोचन संगीत समारोह को शीर्ष प्रदान किया जबकि बांसुरी वादक प्रवीण गोडखिंडी ने जो मधुरता की तान छेड़ी वो सभी के मन में भोर तक तारी रही।
बांसुरी और पखावज की खुमारी में दर्शक डूबते उतराते रहे। छठवीं निशा के दूसरे चरण के डा. वेंकटेश्वर राव का अद्भुत पखावज वादन सभी को लुभा गया। पखावज वादन के दौरान कई बार ऐसा समां बंधा कि दर्शक ताल पर सम्मोहित से हो गए।
इसके बाद मंचासीन हुए बेंगलुरु से आए बांसुरी वादक प्रवीण गोडखिंडी ने अद्भुत प्रदर्शन करते हुए श्रोताओं के मन मस्तिष्क पर मधुर स्वरों का सम्मोहन बिखेर दिया। प्रवीण ने बांसुरी वादन की शुरुआत अहीर ललित में आलापचारी से की।
जोड़ और झाला बजाने के दौरान जिस निपुणता के साथ उन्होंने मुर्की और खटका का प्रयोग किया वह काबिले तारीफ था। मध्यलय में रूपक ताल और तीन ताल में टुकड़े और बंदिशें बजाने के बाद उन्होंने राग मिश्र पहाड़ी में धुन बजाकर बांसुरी वादन को विराम दिया।