वाराणसी। चार वर्षीय पाठ्यक्रम लागू करने से पहले एक संपूर्ण अध्ययन की जरूरत है। यह शिक्षा के लिए अनचाहा थोपा हुआ पाठ्यक्रम है। नई शिक्षा नीति में शिक्षा में लोगों की आसान पहुंच, समानता और गुणवत्ता को बनाए रखने पर सबसे अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। उक्त बातें प्रो. केपी पांडेय ने कहीं। वे शनिवार को संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में शनिवार को दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श के समापन समारोह को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।
पाणिनी भवन सभागार में हुए समारोह में मुख्य अतिथि ने कहा कि समान शिक्षा के लिए कामन स्कूल व्यवस्था पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। विशिष्ट अतिथि नीरज सिंह ने कहा कि शिक्षा निर्माण का कार्य करती है तथा शिक्षा बिना संस्कार अधूरा है। इन्हीं संस्कारों के कारण ही शिक्षा दीक्षा में परिवर्तित हो जाती है। प्रो. आरपी शुक्ल ने कहा कि भारतीय समाज व शिक्षा के अनुशासित जीवन में ज्ञान, कौशल व मानव मूल्य तीनों समाहित हैं। प्रो. कल्पलता पांडेय ने कहा कि शिक्षक राष्ट्र निर्माता है, हमेशा ही राष्ट्र निर्माता रहेगा। अंग्रेजों के इंडिया सेंटर एजुकेशन के स्थान पर भारतीयता से ओतप्रोत भारत केंद्रित शिक्षा की अति आवश्यकता है। प्रो. गोपाल नायक ने कहा कि चार वर्षीय एकीकृत अध्यापक शिक्षा कार्यक्रम बिना किसी आवश्यकता के अध्यापकों पर शिक्षा को थोपा गया है। प्रो. सुधाकर मिश्र ने कहा कि हिंदी व संस्कृत को यथोचित स्थान मिलना चाहिए।
प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, स्वागत प्रो. प्रेमनारायण सिंह एवं मंच संचालन प्रो. राजनाथ ने किया। समापन सत्र की अध्यक्षता प्रो. हेतराम कछवाहा, मंच संचालन डॉ. जगदीश और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. राजनाथ ने किया। समापन के पूर्व बलदेव पीजी कालेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. इंद्रासन सिंह को श्रद्धांजलि दी गई और राष्ट्रगान से राष्ट्रीय संविमर्श का समापन हुआ।