प्रमाणपत्रीय पाठ्यक्रम की विशेषता यह है कि इसमें केवल सैद्धांतिक अध्ययन तक ही सीमित न रहकर, पूर्णतः प्रायोगिक प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया गया है। पाठ्यक्रम की संरचना अत्यंत सघन एवं अनुशासित है इसके अन्तर्गत आहत्य 45 घंटे की कक्षाएं सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक रूप से संचालित की जानी हैं। यह पाठ्यक्रम परंपरागत ज्ञान के संरक्षण एवं रोजगारपरक मार्ग प्रशस्त करेगा। वेद विभाग के आचार्य प्रो. महेंद्रनाथ पांडेय ने कहा कि वर्तमान समय में स्मार्त परंपरा से जुड़े प्रामाणिक एवं प्रशिक्षित कर्मकांडियों की आवश्यकता बढ़ गई है। यह पाठ्यक्रम न केवल परंपरागत ज्ञान के संरक्षण में सहायक सिद्ध होगा, बल्कि युवाओं के लिए आजीविका एवं सेवा के नए अवसर भी सृजित करेगा।