वाराणसी। बनारस घराने के पद्मभूषण पं. सामता प्रसाद मिश्र के तबले का जादू हर किसी के सिर चढ़कर बोला। संगीत-कला की नगरी के हर रंग को सहेजा, संजोया, जिया और विराट व्यक्तित्व का निर्माण किया। 18 जुलाई को उनकी सौंवी जयंती मनाई जाएगी। समारोहों के मंच पर अंगुलियों की थिरकन से नाद ब्रह्मा की अवतारणा करने वाले पं. सामता प्रसाद गुदई महाराज के नाम से हर दिल अजीज थे।
पद्मविभूषण पं. जसराज ने बताया कि 1950 में कलकता में गुदई महाराज का तबला सुना। साढ़े छह घंटे उन्होंने सोलो ही बजाया। हम तो सुनते ही रह गए। उनका तबला सुनकर हमारे ससुर ने कहा कि इस तबले को तो बजवाना है। झनक-झनक पायल बाजे में पं. सामता प्रसाद मिश्र का ही तबला बजा।
पद्मविभूषण पं. हरिप्रसाद चौरसिया का कहना है कि वह ऋषि मुनि थे कलाकार नहीं। सामता प्रसाद जब तबला लेकर बैठ जाते थे तो साक्षात भगवान के दर्शन होते थे। जिन लोगों ने उनको देखा नहीं है, लेकिन अगर उनकी रिकॉर्डिंग सुनेंगे तो उन्हें अहसास होगा कि मैं उन्हें ऐसा क्यों कह रहा हूं।
पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज का कहना है कि वह हमारे चाचा थे। उनका तबला तो कमाल था। तबला बजाने वाले तो बहुत हैं पर जो उनके तबले का टोन लाजवाब था, लता बहिन की आवाज और उनके तबले का टोन एक था। हम लोग कभी रिहर्सल नहीं करते थे सीधे स्टेज पर ही जुगलबंदी होती थी।
संगीत निर्देशक बप्पी लाहिड़ी ने बताया कि जब मैं पांच साल का था मैंने गंडा बंधन कराया था। पं. गुदई महाराज जी झनक-झनक पायल बाजे के समय में कलकता आए थे। उस समय लता मंगेशकर ने गुरु जी से कहा कि इसका गंडा बंधन कराओ। बनारस घराना मेरा प्रिय घराना है।
महसूस होता था बज रहा है महादेव का डमरू
पं. सामता प्रसाद मिश्र के पौत्र गौरव मिश्र का कहना है भारत रत्न पं. भीमसेन जोशी और दादा जी के मित्रवत संबंध थे। पं. भीमसेन जोशी अक्सर कहते थे जब भी पं. सामता प्रसाद जी को सुनता हूं तो महसूस होता है कि महादेव के डमरू का नाद ऐसे ही गूंजता होगा।
फिल्मों में तबले का प्रयोग बन गया इतिहास
पद्मश्री प्रो. राजेश्वर आचार्य का कहना है कि गुदई महाराज की साधना का ही फल था कि उन्होंने जितना प्रयोग तबले का फिल्मों में किया वह इतिहास बन गया। शोले में बसंती का डाकुओं द्वारा पीछा करने के दौरान बैक ग्राउंड म्यूजिक में गुदई महाराज का ही तबला बोला। संगीतकार आरडी बर्मन ने भी गुदई महाराज से संगीत की शिक्षा ली और उनकी कई फिल्मों में गुदई महाराज ने तबला बजाया। इसके अलावा मेरी सूरत तेरी आंखे, झनक झनक पायल बाजे, बसंत बहार जैसी कई फिल्में हैं जिसमें उन्होंने तबले को थाप दी। प्रो. आचार्य ने बताया कि गुदई महाराज एकदम शुद्ध बनारसी थे। विदेशी दौरे पर भी वह बिना किसी बनावट के बनारसी बोली ही बोलते थे। बाहर का खाना तो एकदम नहीं खाते थे। जहां भी जाते उनके साथ बनारसी रसोई जरूरी होती थी।
जन्म -18 जुलाई 1920
निधन- 31 मई 1994
सम्मान- पद्मभूषण सम्मान 1991 में, पद्मश्री सम्मान 1987, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 1979, प्रेसिडेंट स्कॉलरशिप 1972