जीवन दायिनी मानी जाने वाली सई की धारा ठहर गई है। पानी सूखने से अब नदी में रेत उड़ रही है। कई स्थानों पर तो लोग साइकल और पैदल ही लोग नदी को पार कर रहे हैं। प्रदूषण के चलते पानी छूने पर खुजली होने लगती है। नदी के गड्ढों में जहां-जहां पानी जमा है, वह काला पड़ गया है। तटीय इलाकों के ग्रामीणों का कहना है कि काला पानी शरीर पर लगने पर खुजली होने लगती है। दरअसल नदी में इलाके के कल-कारखानों का दूषित पानी छोड़ा जाता है, जिससे पूरी नदी ही दूषित हो जाती है।
नदी के सूखने के बाद पानी जहरीला हो जाता है। ऐेसे पानी को मवेशी भी नहीं पीते हैं। नदी के किनारे जंगली और पालतू जानवरों के सामने पानी का संकट खड़ा हो गया है। नदी सूखने से आसपास के हैंडपंप भी पानी छोड़ने के कगार पर हैं। बिबनमऊ गांव के प्रधान राजेश मिश्रा, तालामझवारा के प्रधान आरती चौबे, प्रेमशंकर गुप्ता, शिक्षक राममूर्ति चौबे का कहना है कि सई नदी जन आस्था से जुड़ी है।
इसके किनारे बसे सैकडों गांवों में विभिन्न अनुष्ठान भी नदी किनारे ही होते हैं। नदी की उपेक्षा से जनजीवन पर भी असर पड़ रहा है। डाक्टर अखिलेश सिंह, हरिशंकर चौबे, प्रधानचार्य पंडित जयशंकर पांडेय, प्रधान रमेश मौर्या, शीतला यादव, बच्चेलाल प्रधान आदि का कहना है कि नदी के किनारे जंगली जानवरों और पालतू पशुओं के लिए पेयजल का संकट खड़ा हो गया है। सरकारी तंत्र की बेरुखी से नदी अस्तित्व को जूझने लगी है। इसके किनारे स्थित कल-कारखानों के सीवर पर ही नियंत्रण लगाने की जरूरत है।