पावक झर तें मेघ झर दाहक दुसह बिसेख/ दहै देह वाके परस याहि दृगन ही देख...। विरह की अग्नि में दहकती बिहारी के इस दोहे की नायिका से कोई विरह की पीड़ा पूछे। एक तरफ बादल गरजते हैं तो दूसरी ओर सूनी सेज पर धीरे-धीरे पांवों से पायल बजने लगती है। चुनर संभालते नहीं संभलती, पुरवाई के झोंकों संग उड़ने लगती है। आंचल भींगने लगता है। तन-मन में उमंग के झूले पड़ने लगते हैं। कवियों से लेकर संगीत गुरुओं तक ने आषाढ़ के उमड़ते मेघों की ओर निहारती हुई विरहिनियों की प्रियतम से मिलन की आतुरता का खूब बखान किया है।
राग मेघ मल्हार का जिक्र आते ही पद्मभूषण पं.छन्नूलाल मिश्र कहते हैं कि आषाढ़ में मल्हार सावन के आने का इंतजार है। यही दूर रहने की कसक भी है और न मिल पाने के विरह की आग भी। वह मल्हार के माहौल में डूबने से खुद को रोक नहीं पाते। उनकी बंदिश में नायिका के विरह का प्रसंग आता है। नायिका अपनी सहेली से कहती है कि -देखो, बादल गरज रहे हैं, बिजली चमक रही है लेकिन मेरे प्रियतम नहीं हैं। इसलिए मेरा मन कहीं नहीं लगता...। फिर वह बंदिश को स्वर देते हैं- छाई घटा घनघोर हमरे सांवरिया नहिं आए.../ बादर मोर पपीहा बोले पुरवाई करे शोर...। आली उमड़ि घन घुमड़ि बरसें/ बूंदन बरसे फुहार...। इसके बाद वह मल्हार में ही दूसरी विरह की बंदिश पर अलाप लेते हैं-बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...।
वह बताते हैं कि राग मेघ मल्हार विरह वेदना को तृप्त करने का राग है। ये राग यूं ही नहीं होते।
मल्हार कभी महान संगीत सम्राट तानसेन ने अकबर के दरबार में जब गाया था तब बारिश होने लगी थी। वह कहते हैं कि मल्हार अगर सही ढंग से लग जाए तो बारिश का होना तय है। पहले कलाकार ऐसे रागों को सिद्ध करते थे। जब रागों की तपस्या की जाती थी, तब बारिश होती थी। साल-साल भर तक एक ही राग पर रियाज किया जाता था। अब जल्दी कोर्स पूरा करने की चिंता गुरुओं को रहेगी तो वो बात आएगी कहां से।