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Varanasi: प्रायश्चित, संकल्प, संस्कार व स्वाध्याय का मेल है श्रावणी उपाकर्म, काशी में हुआ परंपरा का निर्वहन

Sat, 09 Aug 2025 06:04 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: वाराणसी में गंगा में हेमाद्रि स्नान करने के बाद ब्राह्मणों और बटुकों ने बाबा काशी विश्वनाथ का दर्शन किया। इसके साथ ही श्रवण नक्षत्र में ऋगवेदियों ने श्रावणी उपाकर्म किया। 
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ब्राह्मणों और बटुकों ने किया श्रावणी उपाकर्म - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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श्रावण पूर्णिमा को श्रवण नक्षत्र में ब्राह्मणों, विशेष रूप से वेदपाठी, धर्माचार्य, पांडित्यजन और विद्वतजन द्वारा पुरातन काल से चली आ रही वैदिक परंपरा का निर्वहन श्रावणी उपाकर्म संस्कार कहलाता है। इस संस्कार का प्रमुख उद्देश्य वर्षभर में ज्ञात व अज्ञात कारणों से हुई त्रुटियों का प्रायश्चित एवं आत्मशुद्धि कर सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करना है। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के गंगाद्वार पर ऋग्वेदी ब्राह्मणों और सतुआ बाबा आश्रम के बटुकों द्वारा श्रावणी उपाकर्म किया गया।

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वैदिक विद्वान पं. भालचंद्र विनायक बादल के आचार्यत्व में सम्पन्न इस श्रावणी उपाकर्म में हजारों ऋग्वेदी ब्राह्मणों ने भाग लिया। आचार्य भालचंद्र विनायक बादल ने बताया कि श्रावणी के प्रमुख अंग हैं- प्रायश्चित, संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय। यह संस्कार नदी या सरोवर के तट पर व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से किया जाता है।

इसमें हेमाद्रि स्नान किया जाता है और बाह्य व अंतःकरण की शुद्धि के लिए पंचगव्य- अर्थात् गौ-दुग्ध, दधि, घृत, गौमूत्र व गोबर- से स्नान व पान किया जाता है। इसके अलावा नदी की रज, भस्म, अपामार्ग, कुशा आदि से वैदिक विधि अनुसार मंत्रोच्चार के मध्य बाह्य शुद्धि हेतु स्नान का विधान है। अपामार्ग प्राचीन काल की एक औषधि है।

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आचार्य ने बताया कि स्नान के बाद मणिकर्णिका तीर्थ पर स्थित सतुआ बाबा आश्रम में ब्राह्मणजनों द्वारा देव तर्पण, ऋषि तर्पण, पितृ तर्पण, सप्तऋषि पूजन, सूर्योपासना और माँ गायत्री का वैदिक मंत्रों से पूजन किया गया। इसके पश्चात वर्षभर पहनने वाले यज्ञोपवीतों का पूजन कर उन्हें अभिमंत्रित किया गया। श्रावणी उपाकर्म श्रावण पूर्णिमा को श्रवण नक्षत्र में ही किया जाता है।

सतुआ बाबा आश्रम के आचार्य महामंडलेश्वर संतोष दास ने कहा कि श्रावण पूर्णिमा को भाई-बहन रक्षा सूत्र बांधकर एक-दूसरे की रक्षा का वचन लेते हैं। ब्राह्मणजन श्रावणी उपाकर्म करने के बाद अपने गुरुजनों से आशीर्वाद के रूप में रक्षा सूत्र बांधते हैं और काशी विश्वनाथ का दर्शन करने के पश्चात ऋषि पूजन तथा यज्ञोपवीत पूजन पूर्ण करते हैं।

उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी धर्म-कर्म में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है, जिसका उदाहरण कुंभ के मेले की भीड़ है। सनातन का सूर्य युवाओं में पुनः जाग्रत होता दिख रहा है। श्रावणी उपाकर्म में भाग लेने वालों में ओमकार मिश्रा, सूरज, रघुनाथ विनायक बादल, मनीष सहित हजारों की संख्या में ब्राह्मण उपस्थित रहे। 

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