अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत स्वामी नरेंद्र गिरि ने काशी में निकाली गई संतों की अन्याय प्रतिकार यात्रा पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि गणेश प्रतिमा विसर्जन पर लाठीचार्ज के बाद अखाड़ा परिषद और शीर्ष संतों को विश्वास में लिया गया होता तो यह नौबत न आई होती।
उन्होंने काशी की पूजा समितियों से अपील की कि गंगा निर्मलीकरण के लिए आगे आएं और प्रशासन की ओर से खोदवाए गए कुंडों में ही प्रतिमाओं का विसर्जन करें, ताकि टकराव की नौबत न आए।
बंगलूरू के महामंडलेश्वर स्वामी नित्यानंद से मुलाकात के बाद रविवार को छावनी क्षेत्र के एक होटल में नरेंद्र गिरि ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद को प्रतिकार यात्रा निकालने से पहले विसर्जन प्रकरण अखाड़ा परिषद के सामने लाना चाहिए था। ऐसा होता तो संत समाज मिलकर इस पर निर्णय लेता और रणनीति बनाई जाती।
उन्होंने कहा कि जिस दिन प्रतिकार यात्रा निकाली गई, उस दिन मैं सीएम अखिलेश यादव से मिला था। तब सीएम ने मुझसे कहा था कि लाठीचार्ज प्रकरण की मजिस्ट्रेटी जांच का निर्देश दिया गया है। ऐसे में जांच और कार्रवाई का इंतजार करना चाहिए था लेकिन प्रतिकार यात्रा निकाल दी गई।
उन्होंने बताया कि 22 सितंबर को जब लाठीचार्ज हुआ तब हम लोग नासिक में थे। दूसरे दिन पता चलने पर इसकी जानकारी ली गई थी। तब शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी से भी मैंने बात की थी लेकिन उन्होंने बताया था कि इस घटना की जानकारी उन्हें नहीं दी गई है।
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष ने कहा कि काशी महादेव की नगरी है। यहां नवरात्र और दशहरा पर शांति कायम रखने के लिए मैं समितियों से आग्रह कर रहा हूं कि वे गंगा में प्रतिमा विसर्जन पर अपनी जिद छोड़ दें। गंगा में अस्थि विसर्जन की परंपरा है। मूर्ति विसर्जन की परंपरा बहुत पुरानी नहीं है।
इस पर पूजा समितियों को नरम रवैया अपनाना चाहिए। उधर, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि वे अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष पर टिप्पणी नहीं करना चाहते। नरेंद्र गिरि संत हैं और मेरी कोशिश है कि संतों को लेकर इस मौके पर कोई फूट जैसा संदेश समाज में न जाने पाए।