इसी क्रम में शैलेश्वर, संगमेश्वर, स्वर्लीनेश्वर और मध्यमेश्वर की यात्रा चतुरायतन कहलाती है। पंचायतन यात्रा कृत्तिवासेश्वर, मध्यमेश्वर, ओङ्कारेश्वर, कपर्दीश्वर और विश्वेश्वर पहुंचकर पूर्ण होती है। इसी पंचायतन में केदारेश्वर को मिलाने से षष्ठ तीर्थ और त्रिलोचनेश्वर को मिला देने से सप्त तीर्थ यात्रा हो जाती है। पक्ष की प्रत्येक अष्टमी पर विघ्नों की शांति के लिए अष्ट तीर्थ यात्रा में पहले दक्षेश्वर के दर्शन कर फिर पार्वतीश्वर, पशुपतीश्वर, गंगेश्वर, नर्मदेश्वर, गभस्तीश्वर, सतीश्वर और तारकेश्वर के दर्शन होते हैं।
इसी तरह आग्नीध्रकुंड में स्नान कर आग्नीध्रेश्वर, उर्वशीश्वर, नकुलीश्वर, आषाढीश्वर, भारभूतेश्वर, लांगलीश्वर, त्रिपुरांतकेश्वर, मनःप्रकामेश्वर, प्रीतिकेश्वर, मदालसेश्वर और तिलपर्णेश्वर की यात्रा एकादशतीर्थ यात्रा है। पुराणों के अनुसार ये यात्रा करने से मनुष्य रुद्रपद को प्राप्त होता है।
मंगला गौरी मंदिर के महंत नरेंद्र पांडेय वैदिक विद्वान नारायण शेखर द्राविड़ ने बताया कि समय के साथ काशी की यह पौराणिक यात्राएं अब धीरे-धीरे लुप्त हो चुकी हैं। लोग इन यात्राओं और उनके क्रम को भूल चुके हैं।
काशी की जनता को यात्राओं के महात्म्य और उसके महत्व से रूबरू कराने के लिए यात्राओं की शुरूआत की जा रही है। सनातन रक्षक दल के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा ने बताया कि इन यात्राओं को शुरू करने के लिए पीएम के संसदीय कार्यालय के साथ ही मंत्री, विधायक और मेयर को भी पत्र सौंपा गया है।
आठवले जी के बताए मार्ग पर चलकर ही सनातन धर्म और राष्ट्र की सेवा
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत बालाजी आठवले के 83वें जन्मोत्सव पर गोवा में तीन दिवसीय कार्यक्रम हुआ। वाराणसी व्यापार मंडल के अध्यक्ष अजित सिंह बगा ने कहा कि आठवले जी के बताए मार्ग पर चलकर ही हम सनातन धर्म और राष्ट्र की सेवा कर सकते हैं।
हमें तय करना होगा कि अब हम न डरेंगे, न किसी के सामने झुकेंगे, न अत्याचार करेंगे और न ही सहन करेंगे। जब हिंदू समाज सामूहिक रूप से शक्ति संपन्न होगा, तभी हिंदू राष्ट्र का उदय होगा।