ज्येष्ठ पूर्णिमा (29 जून) को सुबह 5:11 बजे से तीनों विग्रहों को स्नान-यात्रा एवं जलाभिषेक किया जाएगा। इस अवसर पर भगवान श्री जगन्नाथ, भाई बलभद्र और देवी सुभद्रा का भव्य महास्नान कराया जाएगा, जिसमें श्रद्धालु स्वयं भी जलाभिषेक कर पुण्य लाभ कमा सकेंगे।
महास्नान के तुरंत बाद 30 जून से 14 जुलाई तक भगवान 'अनवसर काल' (अंशातवास) में चले जाएंगे। मान्यता है कि इस दौरान भारी स्नान के कारण भगवान बीमार हो जाते हैं और विश्राम करते हैं। इस 14 दिनों की अवधि में भगवान के स्वास्थ्य लाभ के लिए विशेष पारंपरिक औषधीय काढ़ा तैयार किया जाएगा, जिसे प्रतिदिन भक्तों में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाएगा।
इसमें कई जड़ी बूटियां विद्यमान होती हैं। इस काढ़े को प्रसाद के रूप में लेने के मंदिर में काफी भक्तों की भीड़ जुटती है। मान्यता है कि इस काढ़े को पीने से कई प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है।
14 जुलाई को नवयौवन रूप में दर्शन देंगे भगवान
14 जुलाई को भगवान पूरी तरह स्वस्थ होकर भक्तों को 'नवयौवन स्वरूप' में दर्शन देंगे। इस दिन महाप्रभु को परवल के जूस का भोग लगाया जाता है। जिसे भक्तों में बांटा जाता है। इसके अगले दिन, 15 जुलाई को दोपहर तीन बजे डोली की भव्य सजावट होगी और शाम चार बजे डोली यात्रा असि चौराहा स्थित मंदिर से प्रस्थान करेगी। यह यात्रा दुर्गाकुंड, नवाबगंज, खोजवां और शंकुलधारा होते हुए रथयात्रा क्षेत्र (पं. बेनीराम बाग) पहुंचेगी।
तीन दिनों तक सजेगा रथयात्रा का मेला
16 से 18 जुलाई तक तीन दिनों तक काशी का रथयात्रा मेला सजेगा। इसे काशी का लक्खा मेला भी कहा जाता है। प्रभु के रथ की एक झलक पाने के लिए लाखों की भीड़ जुटेगी। तीनों देव रथ पर विराजमान होकर जनता को दर्शन देंगे। इसमें सुबह पांच बजे मंगला आरती एवं दर्शन प्रारंभ होंगे।
दोपहर 12 बजे भोग आरती के बाद दोपहर तीन बजे तक पट बंद होंगे। रात आठ बजे आरती और मध्यरात्रि 12 बजे महाआरती होगी। 18 जुलाई की रात 12 बजे महाआरती के साथ मुख्य मेले का समापन होगा। इसके बाद 19 जुलाई को 'बहुड़ा यात्रा' के जरिए भगवान पुनः असि स्थित अपने मुख्य मंदिर लौट आएंगे और 20 जुलाई से नियमित दर्शन-पूजन शुरू हो जाएगा।