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छह साल का शोध: लक्ष्मीबाई का जन्मस्थान मणिकर्णिका, जन्मतिथि मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी; जन्मकुंडली का अध्ययन

Sun, 16 Nov 2025 06:00 AM IST
अमन विश्वकर्मा आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: रानी लक्ष्मीबाई के जीवन और उनके इतिहास को लेकर छह साल तक शोध किए गए। शोधकर्ता उपेंद्र विनायक सहस्त्रबुद्धे ने तिथियों को लेकर भी खास जानकारी दी है।
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झांसी की रानी लक्ष्मीबाई। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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Rani Laxmi Bai: झांसी की रानी और काशी की बेटी महारानी लक्ष्मीबाई का जन्मस्थान मणिकर्णिका परिसर और जन्मतिथि मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी है। यह हकीकत छह साल के शोध और अध्ययन के बाद सामने आई है। इस अवधि में रानी लक्ष्मीबाई की असली जन्मकुंडली का अध्ययन किया गया। इसपर अखिल भारतीय विद्वत परिषद और मराठी विद्वानों ने भी अपनी मुहर लगा दी है।

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भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नायिका रानी लक्ष्मीबाई के जन्मस्थान और जन्मतिथि पर विवाद खत्म हो सकता है। अखिल भारतीय विद्वत परिषद के मुताबिक, महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म 18 नवंबर 1835 की रात 12:40 बजे मणिकर्णिका परिसर में हुआ था क्योंकि जन्म रात 12 बजे के बाद हुआ था इसलिए तिथि 19 नवंबर मानी जाएगी। दक्षिण भारतीय पंचांग गणना के अनुसार जन्मतिथि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी और उत्तर भारतीय पंचांग गणना के अनुसार मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी है।

शोधकर्ता उपेंद्र विनायक सहस्त्रबुद्धे ने बताया कि तिथियों के संदर्भ में दक्षिण और उत्तर भारतीय गणना में कृष्णपक्ष में एक महीने का अंतर होता है। जिस दिन जन्म हुआ उस दिन अधिक मास था। कार्तिक मास की गणना महाराष्ट्र की तिथि परंपरा से है जो काशी में मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी ही होगा। मराठी के इतिहासकार राय बहादुर दत्तात्रेय बलवंत पारसनीस ने अपनी पुस्तक में जन्मतिथि का उल्लेख 19 नवंबर 1835 ही किया है।

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काठ की हवेली में हुआ जन्म
उपेंद्र विनायक सहस्त्रबुद्धे ने बताया कि छह साल तक अध्ययन के बाद पता चला कि रानी लक्ष्मीबाई के पिता का विवाह चौखंभा स्थित काठ की हवेली में हुआ था। जगन्नाथ शास्त्री तैलंग का कहना है कि लक्ष्मीबाई का जन्म भी इसी काठ की हवेली में हुआ था। कुछ स्थानों पर जन्मस्थान के उल्लेख में ब्रह्मनाल भी आया है। तीर्थ के नाम पर ही कन्या का नाम मर्णिकर्णिका किया गया। झांसी के किले पर प्रतिदिन दिखाए जाने वाले लाइट एंड साउंड शो में भी जन्मस्थान मणिकर्णिका ही बताया जाता है।

नष्ट किए जा रहे इतिहास के तथ्य
उपेंद्र विनायक सहस्त्रबुद्धे ने अपनी पुस्तक काशी की कन्या मणिकर्णिका झांसी की रानी लक्ष्मीबाई में लिखा कि इतिहास से जुड़े तथ्यों को नष्ट किया जा रहा है। इसमें कोणभट्ट का अखाड़ा, काठ की हवेली और बाजीराव घाट का अस्तित्व नष्ट कर दिया गया। जिस भूखंड को जन्मस्थान बताया जा रहा है वहां नियमों को ताक पर रखकर स्मारक बनाया गया। नियमानुसार स्मारक के लिए भूखंड स्वामित्व के विषय में अविवादित होना चाहिए। स्मारक पर पधारे क्रांतिकारी तात्या टोपे के परिजन ने स्वीकार किया था कि काशी आने पर पहली बार जो जन्मस्थान और स्मारक दिखाया गया था वह स्थान भिन्न है।
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मणिकर्णिका में जन्म के कारण रखा गया नाम
अखिल भारतीय विद्वत परिषद के राष्ट्रीय महासचिव कामेश्वर उपाध्याय ने बताया कि भारतीय परंपरा के अनुसार नामकरण संस्कार के समय अपने पूर्वजों, तीर्थों या देवी देवताओं के नाम पर पुत्र-पुत्रियों के नाम रखे जाते रहे हैं। मोराेपंत तांबे को कन्या रत्न की प्राप्ति यदि काशी के भदैनी मोहल्ले में हुई होती तो उसका नाम नगर के संदर्भ से काशीबाई, अन्नपूर्णाबाई, दुर्गाबाई...आदि रखा जाना अधिक प्रासंगिक होता। किंतु मोरोपंत तांबे की पत्नी भागीरथी बाई ने कन्या को मणिकर्णिका तीर्थ के निकट जन्म दिया इसलिए कन्या का नाम मणिकर्णिकाबाई रखा गया। इस मामले में महाराष्ट्र के पंचांग की परंपरा के अनुसार विमर्श बेहतर होगा।
इतिहास के शोध और अध्ययन परीक्षण के विषय होते हैं। शोधकर्ताओं का जो भी दावा है उसका अध्ययन कराया जाएगा। तथ्यों के आधार पर ही भदैनी में स्मारक बनाया गया है। अगर कोई बदलाव होता है तो सरकार के दिशा-निर्देशों के हिसाब से काम किया जाएगा। - डॉ. रामनरेश पाल, क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी
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