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रंगभरी एकादशी: काठियावाड़ी कुर्ता और मुंडू में महादेव, बांधनी-पटोला में सजेंगी मां गौरा; खास होगा गौरा का गौना

Sat, 21 Feb 2026 03:18 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: इस बार रंगभरी एकादशी पर बाबा काठियावाड़ी कुर्ता और मुंडू में दिखेंगे। वहीं मां गौरा बांधनी-पटोला में सजेंगी। गुजराती-केरल के वस्त्रों में शिव-गौरा का वैभव दिखेगा। 
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बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की प्रतिमा और परिधान बनाते कारीगर विनोद - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी एक बार फिर परंपरा के अद्भुत संगम की साक्षी बनने जा रही है। रंगभरी एकादशी पर होने वाला गौरा का गौना सांस्कृतिक एकता का संदेश लेकर आएगा। पहली बार बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की चल प्रतिमा को गुजरात, राजस्थान और केरल के पारंपरिक वैभव में अलंकृत किया जाएगा। बाबा और गौरा के परिधान अहमदाबाद, जोधपुर और तिरुवनंतपुरम से मंगाए गए हैं। अंगरखा काठियावाड़ी कुर्ता और मुंडू में बाबा विश्वनाथ और बांधनी-पटोला और कांजीवरम साड़ी में माता गौरा सजेंगी। काशी की गलियों में जब शिव-गौरा नगर भ्रमण पर निकलेंगे तब उत्तर से दक्षिण और पश्चिम भारत की सांस्कृतिक झलक देखने को मिलेगी।

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रंगभरी एकादशी 23 फरवरी को है। इसकी तैयारियां टेढ़ीनीम स्थित पूर्व महंत आवास पर तैयारियां अंतिम चरण में हैं। बाबा और गौरा के गौना में सांस्कृतिक समन्वय का सशक्त संदेश दिया जाएगा। काशी की आध्यात्मिक परंपरा में देश के विविध प्रांतों की छटा समाहित होगी। आयोजक वाचस्पति तिवारी ने बताया कि बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा को गुजराती और केरल के पारंपरिक पुरुष परिधान में सजाया जाएगा।

गुजराती शैली का अंगरखा स्टाइल काठियावाड़ी कुर्ता, केरल की पारंपरिक वेष्टि/धोती (मुंडू) उन्हें धारण कराई जाएगी। पारंपरिक कढ़ाई और सुनहरी जरी से सुसज्जित यह परिधान शिव-गौरा के गौना की गरिमा को और भव्य बनाएगा। उन्होंने बताया कि माता गौरा को नववधू के रूप में अलंकृत किया जाएगा।

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गुजराती बांधनी/पटोला, दक्षिण भारत की प्रसिद्ध कांजीवरम साड़ी, पारंपरिक आभूषणों नथनी, गला-नु हार (हार), कान-नी-बुट्टी (झुमका), बाजूबंद, कमरबंद से माता गौरा सुसज्जित होंगी। दुल्हन की तरह गौरा सजकर नगर भ्रमण पर निकलेंगी। वाचस्पति तिवारी ने बताया कि परिधान देश के विभिन्न प्रांतों से आए हैं, मगर उन्हें अंतिम स्वरूप काशी के कलाकार दे रहे हैं। परिधानों की सिलाई, कढ़ाई और अलंकरण में यहां के कारीगर कर रहे हैं।

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परंपरा के प्रहरी की स्मृति में संकल्प
आयोजन समिति के संयोजक संजीव रत्न मिश्र ने बताया कि स्व. डॉ. कुलपति तिवारी स्वयं को परंपराओं का स्वामी नहीं, बल्कि संवाहक मानते थे। उनका विश्वास था कि काशी की परंपराएं राष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर हैं। अधिग्रहण का दौर हो, कॉरिडोर निर्माण का समय या महामारी का संकट, हर परिस्थिति में उन्होंने परंपराओं को अक्षुण्ण बनाए रखने का संकल्प निभाया। उनका कहना था कि काशी की आस्था को बचाना ही सबसे बड़ा धर्म है। आज काशी वैश्विक मंच पर नए स्वरूप में प्रतिष्ठित है।
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