गुजराती बांधनी/पटोला, दक्षिण भारत की प्रसिद्ध कांजीवरम साड़ी, पारंपरिक आभूषणों नथनी, गला-नु हार (हार), कान-नी-बुट्टी (झुमका), बाजूबंद, कमरबंद से माता गौरा सुसज्जित होंगी। दुल्हन की तरह गौरा सजकर नगर भ्रमण पर निकलेंगी। वाचस्पति तिवारी ने बताया कि परिधान देश के विभिन्न प्रांतों से आए हैं, मगर उन्हें अंतिम स्वरूप काशी के कलाकार दे रहे हैं। परिधानों की सिलाई, कढ़ाई और अलंकरण में यहां के कारीगर कर रहे हैं।
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परंपरा के प्रहरी की स्मृति में संकल्प
आयोजन समिति के संयोजक संजीव रत्न मिश्र ने बताया कि स्व. डॉ. कुलपति तिवारी स्वयं को परंपराओं का स्वामी नहीं, बल्कि संवाहक मानते थे। उनका विश्वास था कि काशी की परंपराएं राष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर हैं। अधिग्रहण का दौर हो, कॉरिडोर निर्माण का समय या महामारी का संकट, हर परिस्थिति में उन्होंने परंपराओं को अक्षुण्ण बनाए रखने का संकल्प निभाया। उनका कहना था कि काशी की आस्था को बचाना ही सबसे बड़ा धर्म है। आज काशी वैश्विक मंच पर नए स्वरूप में प्रतिष्ठित है।