तब अस्सी से प्रह्लाद घाट तक की नावें 31 दिन जाती थीं रामनगर
आईआईटी बीएचयू के प्रोजेक्ट वाराणसी के लिए 10 साल पहले रिसर्च कर चुके अरविंद अरुण मिश्रा ने बताया कि रामनगर की रामलीला के नेमियों की जलमार्ग परंपरा भी रही। काशी के अस्सी से लेकर प्रह्लादघाट के 50 से ज्यादा घाटों से 100 से ज्यादा नावें चलती थीं जो नेमियों को रामनगर ले जाने के लिए गंगा पार कराती थीं। ये पूरे 31 दिनों तक चलती थीं। तब क्या राजा, क्या प्रजा, हर कोई साफा-पानी, भांग-बूटी, चंदन-काटी, काजल-टीका, पान-पत्ता लेकर नावों पर सवार हो जाता था। यह गंगा मेला की तरह होता था। हर कोई गंगा की गोद में भजन गाते-बजाते रामनगर पहुंचता था। मांझियों के लिए यही देव दीपावली थी। यही पर्यटन और आय का बड़ा साधन था। उस समय रामलीला नौका परिवहन की बड़ी वजह थी। 1867 में राजघाट का डफरिन या मालवीय पुल बना तो लोग इक्का, तांगा, नए नहाए-धोये घोड़ों से पहुंचने लगे। 1998 के दशक में विश्व सुंदरी पुल और 2015 में रामनगर पुल बना और नेमी इन पुलों से रामनगर पहुंचने लगे।