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काशी की रामलीला: अस्सी से प्रह्लाद घाट तक की नावें 31 दिन जाती थीं रामनगर, 200 साल में नहीं बदली परंपरा

Mon, 21 Sep 2026 11:07 AM IST
Pragati Chand हिमांशु अस्थाना, अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी।

सार

वाराणसी में रामनगर की रामलीला आज भी 200 साल पुरानी परंपरा पर कायम है। इन 200 वर्षों में कभी नेमियों का जलमार्ग, कभी राजघाट पुल पर घुड़दौड़, पीपा पुल की भी सवारी हुई। 
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रामनगर की रामलीला - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जेम्स प्रिंसेप से जेन-जी तक रामनगर की रामलीला मंचन परंपरा में पेट्रोमैक्स और परिवहन छोड़कर कोई बदलाव नहीं हुआ। 200 साल पहले भी पीढ़ा, गुटका, चंदन और हाथ में मानस लेकर पहुंचने वाले नेमी श्रोता आज भी वैसे ही आते हैं। कभी गंगा का पानी नेमियों का जलमार्ग बना, कभी राजघाट पुल पर दौड़ते घोड़े तो कभी पीपा पुल से होकर नेमी रामनगर पहुंचे। ब्रिटिश लाइब्रेरी में 1833 में उकेरा गया जेम्स प्रिंसेप का चित्र और आज की डिजिटल फोटोग्राफी में रामलीला के मंचन और भीड़ में कोई खास फर्क नहीं दिखता।

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बीएचयू में पर्यटन प्रबंधन के प्रोफेसर डॉ. राणा प्रवीन के अनुसार, इसका स्वरूप क्यों नहीं बदला या किसी ने बदलने नहीं दिया, इसका पता 50 साल पहले रामनगर आए प्रसिद्ध अमेरिकी रंगकर्मी और न्यूयॉर्क प्रायोगिक रंगमंच कंपनी द परफॉर्मेंस ग्रुप के संस्थापक रिचर्ड शेचनर देते थे। 

1976 में रिचर्ड आए तो अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि यदि इसका पश्चिमी यूरोप और अमेरिका के रंगमंच की तरह से आधुनिकीकरण हुआ तो यह सिर्फ पर्यटन के आकर्षण के रूप में ही रह जाएगा। हालांकि, इस समाज को देखकर महसूस हो रहा है कि इनका आधुनिकीकरण संभव नहीं। शेचनर ने रामलीला को धर्म, मेला, तीर्थयात्रा और यूरोप-अमेरिकी नाटकों से ज्यादा बेहतर बताया था। यह भी कहा था कि भारतीय फिल्मों को मैं पतनशील मानता हूं लेकिन ये रामलीला नहीं। इन्होंने 1977 में प्रकाशित ड्रामा रिव्यू में इन बातों की चर्चा की है।

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रामनगर की रामलीला - फोटो : अमर उजाला
तब अस्सी से प्रह्लाद घाट तक की नावें 31 दिन जाती थीं रामनगर
आईआईटी बीएचयू के प्रोजेक्ट वाराणसी के लिए 10 साल पहले रिसर्च कर चुके अरविंद अरुण मिश्रा ने बताया कि रामनगर की रामलीला के नेमियों की जलमार्ग परंपरा भी रही। काशी के अस्सी से लेकर प्रह्लादघाट के 50 से ज्यादा घाटों से 100 से ज्यादा नावें चलती थीं जो नेमियों को रामनगर ले जाने के लिए गंगा पार कराती थीं। ये पूरे 31 दिनों तक चलती थीं। तब क्या राजा, क्या प्रजा, हर कोई साफा-पानी, भांग-बूटी, चंदन-काटी, काजल-टीका, पान-पत्ता लेकर नावों पर सवार हो जाता था। यह गंगा मेला की तरह होता था। हर कोई गंगा की गोद में भजन गाते-बजाते रामनगर पहुंचता था। मांझियों के लिए यही देव दीपावली थी। यही पर्यटन और आय का बड़ा साधन था। उस समय रामलीला नौका परिवहन की बड़ी वजह थी। 1867 में राजघाट का डफरिन या मालवीय पुल बना तो लोग इक्का, तांगा, नए नहाए-धोये घोड़ों से पहुंचने लगे। 1998 के दशक में विश्व सुंदरी पुल और 2015 में रामनगर पुल बना और नेमी इन पुलों से रामनगर पहुंचने लगे। 
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