वाराणसी। चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर...। हे राम अहिल्या ने आपका बहुत इंतजार किया है। आप इनको अपने चरण कमल की रज से पवित्र करो। फिर भगवान ने अपने चरणों का स्पर्श अहिल्या को दिया और जैसे ही स्पर्श हुआ वहां पर तपोमूर्ति अहिल्या प्रकट हो गईं। रामनगर की रामलीला के तीसरे शनिवार को राक्षसों से परेशान विश्वामित्र यज्ञ की रक्षा के लिए राजा दशरथ के दरबार में पहुंचते हैं और उनसे उनको दो पुत्रों को मांगते हैं। राजा दशरथ पहले तो इंकार करते हैं लेकिन गुरु वशिष्ठ के समझाने पर वह राम और लक्ष्मण को उनके साथ भेज देते हैं।
मुनि विश्वामित्र के साथ गए दोनों भाई उनके यज्ञ की रक्षा करते हुए ताड़का और सुबाहु को युद्ध में मार गिराते हैं। राक्षसों के मारे जाने पर विश्वामित्र की चिंता दूर हो जाती है। दोनों भाइयों की साधु-संतों के साथ देवता भी जय-जयकार करने लगते हैं। रास्ते में एक आश्रम को देखकर दोनों भाई आश्रम और रास्ते में पड़ी एक शिला के बारे में मुनि विश्वामित्र से पूछते हैं। विश्वामित्र बताते हैं कि श्राप के कारण गौतम मुनि की पत्नी अहिल्या शिला बन गई हैं। मुनि के कहने पर भगवान अपने पैर से छूकर उन्हें श्राप से मुक्त कर देते हैं। अहिल्या उनके चरणों में गिरकर स्वर्गलोक चली जाती हैं। दोनों भाई गंगा दर्शन करने के बाद जनकपुर पहुंचते हैं। मुनि के साथ भोजन करके सभी विश्राम करते हैं। यहीं पर आरती के बाद लीला को विश्राम दे दिया जाता है।
रामनगर की रामलीला में ताड़का वध की लीला ऐसी है जो मुस्लिम इलाके वारी गढ़ही से होकर गुजरती है। मंशा देवी मंदिर के बगल की गली से होकर वारी गढ़ही से होते हुए ताड़का वध स्थल लीला वाजदापुर पहुंची। इस दौरान मुस्लिम बंधु खासा उत्साहित रहे। लीला स्थल पर मेले जैसा नजारा रहा। काशी राज के प्रतिनिधि अनंत नारायण सिंह कार से ताड़का वध स्थल पर पहुंचे। गुड के जलेबा की बिक्री भी खूब हुई। लीला स्थल के आसपास दर्जनों की संख्या में दुकानें लगी रहीं।
नगरपालिका का सफाई अभियान हवा हवाई साबित हुआ। पालिका प्रशासन ने रामलीला के पूर्व सफाई में पूरी ताकत झोंक दी थी लेकिन तस्वीर कुछ अलग ही कहानी बयां कर रही है। अयोध्या से निकल कर जब प्रभु के साथ-साथ रामलीला आगे चली तो अधिकांश जगहों पर कीचड़ और पानी रास्ते में मिला। आज की लीला में अयोध्या से निकलकर गोलमंडी से होकर वारीगढ़ही होते हुए लीला अस्पताल के पीछे वाजिदपुर ताड़का वध स्थल पहुँची। वारीगढ़ही पर सीवर तो ताड़का वध स्थल गोबर से पटा था।