मांगी नाव न केवट आना, कहे तोहार मरम मैं जाना...। केवट ने गंगा पार पहुंचाने का भगवान राम का अनुरोध बड़ी विनम्रता से ठुकरा दिया। कहा प्रभु आपके चरणों में पत्थर को मानव बनाने का चमत्कार है। मेरी लकड़ी की नाव अगर स्त्री बन गई तो मेरे परिवार का पोषण कौन करेगा। बृहस्पतिवार को श्री गोस्वामी तुलसीदास रामलीला समिति की ओर आयोजित रामलीला में गंगा उतरण, भारद्वाज समागम और वाल्मिकी समागम की लीला का मंचन किया गया।
वन में वटवृक्ष के दूध से जटा बनाते श्रीराम को देख मंत्री सुमंत रो पड़े। सीता अयोध्या वापस जाने की बात को अपने तर्को से काट मंत्री को निरुत्तर कर देती हैं। गंगा तट पहुंचने पर केवट श्रीराम को पैर पखारे बिना गंगा पार कराने से मना कर देता है। इस पर लक्ष्मण क्रोधित हो उठते हैं। केवट विनम्रता से कहता है लक्ष्मण उन्हें तीर भले ही मार दें, लेकिन बिना पांव पखारे वे तीनों को अपनी नौका पर नहीं बैठाएगा। केवट भी आज्ञा पाकर कठौते में गंगा जल ले आया। केवट द्वारा प्रभु राम, सीता व लक्ष्मण का पांव पखारते देख देवगण उसके भाग्य को सराहते हैं। देवी गंगा भी श्रीराम के चरण स्पर्श कर प्रसन्न हैं। नदी पार उतारने पर केवट श्रीराम से उतराई लेने से इनकार करता है। कहता है प्रभु एक ही पेशे से जुड़े लोग एक दूसरे से पारिश्रमिक नहीं लेते। प्रयागराज में स्नान कर सभी भारद्वाज ऋ षि के आश्रम पहुंचे। राम के आगमन का समाचार सुन महर्षि वाल्मीकि उन्हें अपने आश्रम लेकर आते हैं। महर्षि की सलाह पर श्रीराम चित्रकूट में रहने का निर्णय लेते हैं। महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने स्वरूपों की आरती उतारी। वहीं चित्रकूट रामलीला के अयोध्या भवन में जनक सभा का आयोजन हुआ।
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आज की रामलीला
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तुलसी-भरत मनावन
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चित्रकूट-श्री भरत विदाई,नंदीग्राम की झांकी