लीला के दौरान श्रीराम के वन गमन की बात सुनकर माता सीता ने भी उनके साथ चलने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया। प्रभु राम ने उन्हें अयोध्या में रहकर सास-ससुर की सेवा करने की सीख दी, किंतु सीता के इस निरुत्तर कर देने वाले प्रश्न, जब आप वन में हों तो मैं महलों का सुख कैसे भोग सकती हूँ? के आगे उन्हें स्वीकृति देनी पड़ी। वहीं, माता सुमित्रा की आज्ञा लेकर अनुज लक्ष्मण भी प्रभु की सेवा के भाव से साथ हो लिए।
कोपभवन में जब तीनों पिता की आज्ञा लेने पहुंचे, तो कैकेयी के कठोर वचनों को सुनकर राजा दशरथ मूर्छित हो गए। कैकेयी द्वारा मुनियों के वेश वाले वस्त्र दिए जाने के उपरांत श्रीराम ने उन्हें प्रणाम किया और गुरु वशिष्ठ को अयोध्या की बागडोर सौंपकर वन की ओर प्रस्थान किया। होश में आने पर व्याकुल दशरथ ने मंत्री सुमंत को रथ लेकर इस आस में भेजा कि वे श्रीराम को समझा-बुझाकर वापस ले आएं।
मार्ग में प्रभु के आगमन का समाचार पाकर श्रृंगवेरपुर के निषादराज कंद, मूल और फल की भेंट लेकर दर्शन को दौड़े चले आए। उन्होंने प्रभु से गांव में ठहरने का आग्रह किया, किंतु मर्यादा का पालन करते हुए श्रीराम ने सिंगुआ वृक्ष के नीचे ही विश्राम करना स्वीकार किया। रात्रि में श्रीराम और सीता को नंगे धरातल पर शयन करते देख निषादराज व्याकुल होकर रो पड़े। तब लक्ष्मण ने उन्हें जीवन के मोह और नश्वरता का उपदेश देते हुए प्रभु के चरण कमलों में अनुराग रखने की सीख दी। अंत में भावपूर्ण आरती के साथ नवें दिन की लीला को विश्राम दिया गया।