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रामलीला: राजपद त्याग वन को चले राम, सीता और लक्ष्मण भी साथ; दृश्य देख निषादराज व्याकुल

Sun, 04 Oct 2026 06:20 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला में वनगमन प्रसंग का भावुक मंचन हुआ। राजपद त्यागकर भगवान राम, सीता और लक्ष्मण के साथ वन को चले। राम-सीता को धरातल पर सोते देख निषादराज व्याकुल हो उठे और उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। ‘चलत राम लखि अवध अनाथा, विकल लोग सब लागे साथा’ प्रसंग ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।

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रामलीला का मंचन करते कलाकार। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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चलत राम लखि अवध अनाथा, विकल लोग सब लागे साथा.. अर्थात् अयोध्या से जब राम, लक्ष्मण और सीता वन के लिए प्रस्थान करते हैं, तो उनके पीछे पुरवासी भी चलने लगते हैं। सबका बस एक ही कहना कि राम के जाते ही अयोध्या अनाथ हो जाएगी। किरदारों की भूमिका निभा रहे पात्रों के मंचन को देखकर सामने बैठे श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। उन्हें ऐसा लगा जैसे वे सच में राम-लक्ष्मण को वन जाते देख रहे हैं।

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रामलीला के नौवें दिन शनिवार को भगवान श्रीराम के वन गमन का अत्यंत कारुणिक और भावपूर्ण मंचन हुआ। पिता राजा दशरथ के वचनों की मर्यादा की खातिर श्रीराम ने तनिक भी हिचकिचाए बिना राजपद का मोह त्याग दिया। जब उन्होंने वन की राह पकड़ी, तो उनके साथ सीता और लक्ष्मण ही नहीं, बल्कि समूची अयोध्या की आंखें नम होकर उनके पीछे डगर पर चल पड़ीं।

लीला के दौरान श्रीराम के वन गमन की बात सुनकर माता सीता ने भी उनके साथ चलने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया। प्रभु राम ने उन्हें अयोध्या में रहकर सास-ससुर की सेवा करने की सीख दी, किंतु सीता के इस निरुत्तर कर देने वाले प्रश्न, जब आप वन में हों तो मैं महलों का सुख कैसे भोग सकती हूँ? के आगे उन्हें स्वीकृति देनी पड़ी। वहीं, माता सुमित्रा की आज्ञा लेकर अनुज लक्ष्मण भी प्रभु की सेवा के भाव से साथ हो लिए।

कोपभवन में जब तीनों पिता की आज्ञा लेने पहुंचे, तो कैकेयी के कठोर वचनों को सुनकर राजा दशरथ मूर्छित हो गए। कैकेयी द्वारा मुनियों के वेश वाले वस्त्र दिए जाने के उपरांत श्रीराम ने उन्हें प्रणाम किया और गुरु वशिष्ठ को अयोध्या की बागडोर सौंपकर वन की ओर प्रस्थान किया। होश में आने पर व्याकुल दशरथ ने मंत्री सुमंत को रथ लेकर इस आस में भेजा कि वे श्रीराम को समझा-बुझाकर वापस ले आएं।
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मार्ग में प्रभु के आगमन का समाचार पाकर श्रृंगवेरपुर के निषादराज कंद, मूल और फल की भेंट लेकर दर्शन को दौड़े चले आए। उन्होंने प्रभु से गांव में ठहरने का आग्रह किया, किंतु मर्यादा का पालन करते हुए श्रीराम ने सिंगुआ वृक्ष के नीचे ही विश्राम करना स्वीकार किया। रात्रि में श्रीराम और सीता को नंगे धरातल पर शयन करते देख निषादराज व्याकुल होकर रो पड़े। तब लक्ष्मण ने उन्हें जीवन के मोह और नश्वरता का उपदेश देते हुए प्रभु के चरण कमलों में अनुराग रखने की सीख दी। अंत में भावपूर्ण आरती के साथ नवें दिन की लीला को विश्राम दिया गया।
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