ऐसे में ढोल गंवार, शूद्र इस गलत पाठ के प्रचार से लोगों में भ्रांति व्याप्त है। तुलसीदास की इस चौपाई की व्याख्या में उन्होंने कहा कि ढोल को पीटने से ध्वनि आती है। गंवार का अर्थ असभ्य है और क्षुद्र का अर्थ अमरकोश के अनुसार क्रूर है। डा. रामरुस रसिकेश के आदर्श हिन्दी संस्कृत कोश के अनुसार कुटिल है। पशुनारी के अर्थ पर उनका कहना है कि दुष्ट बुद्धि वाली नारी है।
श्रीविश्वेश्वर शास्त्री द्राविड़ एवं श्रीगणेश्वर शास्त्री द्राविड़
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गणेश्वर शास्त्री द्राविड़ का कहना है कि भगवान राम ने निषादराज को सम्मानित किया। इसी तरह शबरी, तारा, स्वयंप्रभा और मंदोदरी के नारी होते हुए भी उन्हें ताड़ित नहीं किया। उनका कहना है कि रामचरित मानस काव्य है। इसमें अनुचित बात नहीं लिखी जा सकती।
गणेश्वर शास्त्री द्राविड़ की गिनती काशी के प्रकांड विद्वानों में होती है। उन्होंने अयोध्या में निर्माणाधीन रामलला दरबार में प्राण प्रतिष्ठा के लिए शुभ मुहूर्त निकाला है। इससे पहले उन्होंने जन्मस्थान पर भगवान राम के भव्य मंदिर के शिलान्यास के लिए मुहूर्त निकाला था। द्राविड़ ने काशी विश्वनाथ धाम के लोकार्पण के शुभ मुहूर्त में भी सलाह दी थी।
संकट मोचन मंदिर के महंत।
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संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो विश्वंभर नाथ मिश्र ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने काशी के तुलसीघाट पर ही रामचरित मानस की रचना की है। इसकी मूल प्रति के अध्ययन में स्पष्ट है कि शूद्र नहीं, क्षुद्र लिखा है। क्षुद्र का अर्थ कुटिलता से है। ऐसे ही पशुनारी का अर्थ दुष्ट महिला से है। शब्दों को अपभ्रंश कर उसके गलत निहितार्थ निकाले जा रहे हैं।