आजादी के बाद से अब तक की भारतीय राजनीति में जमीन-आसमान का फर्क आया है। अब गरीबों के राशन कार्ड बनवाने हों या हैंडपंप आवंटन। बिना कमीशन के कोई काम नहीं होता लेकिन एक दौर था जब नेता जनता के लिए जीते थे।
राजनारायण के चुनावों का प्रबंधन देख चुके उनके भतीजे हर्ष वर्धन सिंह बताते हैं कि वह घरवालों से छिपाकर अनाज की बोरियां गरीबों के लिए भिजवा दिया करते थे। लखनऊ, दिल्ली के स्थित उनके आवास पर हर रोज सौ-50 लोगों का खाना बनता था।
वे सबका काम भी कराते थे और किराया-भाड़ा देकर विदा भी करते थे। एक बार तो उन्होंने सरकार की ओर से अधिगृहीत की गई कलेक्ट्री फार्म की जमीन किसानों से जोतवा दी।
लोकबंधु राजनारायण के बारे में कहा जाता है कि उनका एक पैर रेल में और दूसरा जेल में होता था।
सबके सुख-दुख को जानने वाले वह ऐसे नेता थे, जिनके पीछे भीड़ नहीं, रेला चलता था। 1952 में पहली बार जब आराजीलाइन से सोसलिस्ट उम्मीदवार के रूप में वह चुनाव मैदान में उतरे तब रिश्तेदारों को चिह्नित कर वहां प्रमुख कार्यकर्ताओं को चुनाव भर टिकाने की व्यवस्था की गई थी। बस्तियों में रात-रात भर कार्यकर्ता पड़ाव डालते थे। गांव-गांव से आटा-दाल, चावल आता था।
रात को प्रचार की रणनीति बनती थी। तब इस दौर की तरह होर्डिंग लगाने, पोस्टर छापने, बांटने का चलन नहीं था। अब के नेताओं के पीछे चलने वाले गनर, कारों के काफिले उनके साथ नहीं होते थे। गांव-गांव महिलाओं, युवाओं, बुजुर्गों की पैदल टोलियां चलती थीं। विधान सभा चुनाव में आराजीलाइन विधानसभा सीट से उन्होंने उस समय के लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी ऋषि नारायण शास्त्री को हराया था।