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राजेंद्र यादव ने निकाली थी स्त्री-दलित विमर्श की राह

Fri, 21 Oct 2016 01:51 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव दलित और स्त्री विमर्श की नई राह निकालने वाले साहित्यकार के रूप में हमेशा याद किए जाएंगे। सामान्य लोगों के भीतर छिपे लेखक को पहचानने, उसे प्रोत्साहित करने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। मुझ जैसी गांव की महिला को प्रतिष्ठित कथाकार के रूप में उन्होंने निखारा। स्त्री और दलित विमर्श को उन्होंने तब दिशा दी, जब हिंदी साहित्य पितृसत्तात्मक और जड़ता का शिकार था। राजेंद्र यादव ने इस जड़ता को तोड़ते हुए साहित्य के अंत:करण का विस्तार किया।’ प्रसिद्ध कथाकार मैत्रैयी पुष्पा ने ये बातें गुरुवार की दोपहर बीएचयू के कला संकाय के राधाकृष्णन सभागार में ‘हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता, हंस और राजेंद्र यादव’ विषयक परिचर्चा के पहले दिन बतौर मुख्य अतिथि कहीं।
यह संगोष्ठी साखी और भोजपुरी अध्ययन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई। दीप प्रज्ज्वलन के बाद परिचर्चा में मुख्य वक्ता साहित्यकार जयप्रकाश कर्दम ने कहा कि हाशिए का समाज राजेंद्र यादव की चिंता में सर्वाधिक रहा।
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अध्यक्षता कर रहे कथाकार प्रो. काशीनाथ सिंह ने उनकी जीवनी पर प्रकाश डालते हुए उनके पूरे साहित्य से लोगों को परिचित कराया। कहा कि राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ में कहानी-कविता के अलावा उनके संस्मरणों एवं यात्रा वृत्तांतों को प्रकाशित कर हिंदी साहित्य को विस्तारित और समृद्ध बनाया। राजेंद्र यादव की पुत्री रचना यादव ने कहा कि ‘हंस’ आजीवन उनकी हर सांस में रही। दो सत्रों में चले इस कार्यक्रम के पहले सत्र का उद्घाटन मालवीय जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण के बाद कुलगीत से हुआ। अतिथियों का स्वागत स्मृति चिन्ह एवं भोजपुरिया प्रतीक गमछा देकर किया गया। स्वागत भाषण में भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. सदानंद शाही ने कहा कि राजेंद्र यादव ने हिंदी साहित्य का लोकतंत्रीकरण किया। साहित्य में दलितों, महिलाओं और पिछड़ों की एक पौध उन्होंने विकसित की। इस सत्र का संचालन डॉ. उर्वशी गहलौत ने किया। द्वितीय सत्र में वीरेंद्र यादव, डॉ. रामाज्ञा शशिधर, डॉ. शशिकला त्रिपाठी ने विचार व्यक्त किए। अध्यक्षता प्रो. चौथीराम यादव ने की। संचालन शिवेंद्र मौर्य, धन्यवाद ज्ञापन विश्वमौलि ने किया।
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