पद्मविभूषण पं. किशन महाराज को जितनी महारत तबले पर हासिल थी, उतना ही दखल वह सामाजिक सरोकारों में भी रखते थे। कारगिल युद्ध के दौरान बनारस में उन्होंने सबसे पहले सेना के लिए फंड जुटाने की शुरुआत की थी। उन्होंने झोली फैलाकर खुद सेना के जवानों के लिए चंदा जुटाया था। उनकी पहल का ही असर था कि पूरा बनारस अभियान में जुड़ता चला गया।
पं. किशन महाराज की बेटी अंजली महाराज ने बताया कि पापा की अंगुलियां भले ही खामोश हो गई हों, लेकिन तबले की थाप आज भी उसी तरह से कानों में गूंजती है। बनारस की माटी की ही तासीर थी जो उनके स्वभाव में झलकती थी। सहजता के साथ ही फक्कड़पन और अक्खड़पन को हर कोई महसूस कर सकता था। किसी कलाकार का दर्द हो तो वह सबसे पहले मदद को खड़े हो जाते थे।
संगतकारों को सम्मान दिलाने में पं. किशन महाराज का योगदान अप्रतिम है। बनारस से लगाव ऐसा था कि पद, पैसा और प्रतिष्ठा का ऑफर मिलने के बाद भी देश तो क्या कभी बनारस नहीं छोड़ा। वरिष्ठ पत्रकार पद्मपति शर्मा ने बताया कि कबीरचौरा में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर तीन सितंबर 1923 को उनका जन्म हुआ था। पिता पं. हरि महाराज और ताऊ पं. कंठे महाराज ने तबले पर जो हाथ चलाना सिखाया तो पूरी दुनिया आज भी उस थाप की दीवानी है। देश के हर शीर्ष कलाकार के साथ उन्होंने मंच साझा किया।
प्रमुख सम्मान
- 1973 में पद्मश्री
- 1984 में केंद्रीय संगीत नाटक पुरस्कार
- 1986 में उस्ताद इनायत अली खान पुरस्कार
- 2002 में पद्मविभूषण
- दीनानाथ मंगेशकर पुरस्कार, ताल विलास, उत्तरप्रदेश रत्न, उत्तर प्रदेश
- गौरव, भोजपुरी रत्न, भागीरथ सम्मान और लाइफ टाइम अचीवमेंट सम्मान भी उन्हें मिले।