बीएचयू के महिला महाविद्यालय में आयोजित संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि प्रो. इशरत आलम ने छात्रों से अपने विचार साझा किए। इस दौरान उन्होंने कहा कि अरब-भारतीय वैज्ञानिक आदान-प्रदान, अल-ख्वारिज्मी, अल-बरूनी जैसे विद्वानों में भारतीय ग्रंथों के अध्ययन और प्रसार किया।
बीएचयू के महिला महाविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में भारत के वैज्ञानिक इतिहास की समीक्षा की गई। वेदों से लेकर मध्यकालीन ग्रंथों और वर्तमान तकनीक पर बातें हुईं। पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर नई दिशा देने की सहमति बनी।
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महिला महाविद्यालय के कांफ्रेंस हॉल में फ्रॉम वेदास टू विजन: इंडियाज साइंटिफिक पाथ थ्रू द एजेस और वैदिक विरासत एवं भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी में योगदान विषय पर एक विशेष व्याख्यान किया गया।
मुख्य अतिथि प्रो. इशरत आलम ने छात्रों से रसशास्त्र, धातुकर्म, सुगंध-प्रौद्योगिकी, कांच, सिंधु-सरस्वती सभ्यता की जल-इंजीनियरिंग, प्राचीन गणित में शून्य और दशमलव प्रणाली की उपलब्धियां गिनाईं। उन्होंने कहा कि अरब-भारतीय वैज्ञानिक आदान-प्रदान, अल-ख्वारिज्मी, अल-बरूनी जैसे विद्वानों में भारतीय ग्रंथों के अध्ययन और प्रसार किया।
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वेद और खनिज तकनीक पर चर्चा
विशिष्ट अतिथि प्रो. विभा त्रिपाठी ने वेदों, आयुर्वेद, रसशास्त्र, धातुविज्ञान, खनिज तकनीक में वैज्ञानिक प्रयोगशीलता की चर्चा की। प्राचार्या प्रो. रीता सिंह ने भारत की समृद्ध सांस्कृतिक वैज्ञानिक पहचान, आयुर्वेद, दर्शन और उपनिषदों में निहित ज्ञान की दुनिया भर में प्रासंगिकता बढ़ रही है। संयोजक वाईएस रेड्डी ने भी अपने विचार रखे।