कुछ को यहां पर शौच करता देख सभी अमेरिकी मेहमानों ने नजरें नीची कर लीं और फोटोग्राफी का फोकस रेतों की ओर मुड़ गया। तब लगा कि नाव से बाहरियों को घुमाना रिस्की है। बदबू इतनी होती थी कि घाट पर पैदल तो जा ही नहीं सकते थे। रात में निकलो तो सिर्फ तमस-तमाशा, नशा और हताशा। ये सब कुछ 25-30 साल पहले तक हुआ। आज घाटों की रातें दुनिया जहां में दिन से ज्यादा नामचीन और चमकीलीं हो गईं हैं।
तो गुरु काशी घूमना है न तो ई-रिक्शा, बाइक, कार या हेलीकॉप्टर को पीछे ही छोड़ दो। अपने अंदर काशी के अक्कड़, बक्कड़ और फक्कड़पन का इंजेक्शन लगा लो। फिर कितनी भी हताशा हो, सात किलोमीटर का ये लंबा गंगा तट और इस पर बने 100 से 400 फीट ऊंचे घाट और अनियोजित और बेतरतीब बनीं इमारतें जीवन के नए अक्स से मिलवा देती हैं। हर साल भीषण बाढ़ की चपेट में आने के बावजूद भी सदियों से इन घाटों का वजूद अटल, अजर और अमर है।
ड्रोन से काशी को निहारने वाले सस्ते-महंगे रील स्टार सोशल मीडिया पर काशी को तथ्यों और परंपराओं से विहीन बनाते जा रहे हैं। मगर काशी का परिचय लेना है तो 1300 साल पुराने स्कंद पुराण के काशी खंड का पारण करना पड़ेगा। हर घाट और हर गली में अदृश्य देवताओं के वास का वर्तमान पता निकाला जा सकता है।
आप तो भगवान के दर्शन के लिए काशी आए ही हैं मगर कुछ देवता आप जैसे भक्तों के दर्शन के इंतजार में भी हैं। अंतरराष्ट्रीय काशी घाट वॉक का तीर्थायन और काशी ढूंढे इसी तरह की एक सीरीज है, जिसमें 2600 तीर्थयात्री जुड़ गए। काशी में देवताओं के दर्शन करना और आशीर्वाद ले लेना एक डिग्री के बराबर है।
लगता है कि काशी के घाटों और गंगा की कई परिपाटियां भी धारा के साथ बह गई हैं। जैसे कि कार्तिक एकादशी पर हम लोग देखा करते थे। ठीक सुबह 6:30 बजे महाराज बनारस पंचगंगा घाट से स्नान करके राजसी वेष और दरबारियों संग अपने स्टीमर से निकलते थे। 7:30 बजे अस्सी घाट को पार करते थे। उस दिन काशीवासी इस शाही गंगा सवारी का इंतजार करते थे।
अस्सी घाट से महाराज की नाव बाएं घूमकर बीच गंगा में पहुंचती थी और वहां से रामनगर किले की ओर से चलती थी। इसी दिन कार्तिक एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक 80 से ज्यादा घाटों पर भीम पूजे जाते थे जो परंपरा अब भुला दी गई। घाटों पर मिट्टी के भीम बनते थे। इनकी पूजा होती थी। अब सिर्फ केदारघाट, तुलसी घाट और पंचगंगा घाट पर ऐसा होता है।
आज हम बीएचयू अस्पताल को पूरब की लाइफलाइन क्यों कहते हैं। इसमें पिछले 30-40 साल में बिहार, एमपी, झारखंड और नेपाल तक के मरीजों को अपने आकर्षण शक्ति में बांध सा दिया है। इसके पीछे जो लोग थे उनमें हड्डी के डॉक्टर प्रो. टीपी श्रीवास्तव, चेस्ट स्पेशलिस्ट प्रो. वीके झा, आई स्पेशिलस्ट प्रो. नेमा, न्यूरो सर्जन प्रो. मोहंती। ये एम्स और चंडीगढ़ पीजीआई छोड़कर आए हुए डॉक्टर थे। इनमें से ज्यादातर इस दुनिया में ही नहीं हैं।