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परिवर्तन की राजनीति के लिए बनारस को केंद्र बनाते थे पूर्व पीएम चंद्रशेखर

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वाराणसी। आत्मनिर्भर भारत के प्रबल समर्थक रहे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की राजनीति का केंद्र बनारस ही रहा। देश की सियासत में परिवर्तन की आवाज उन्होंने बनारस से ही बुलंद की। बुधवार को उनकी पुण्यतिथि पर बरबस ही उनकी यादें बनारस को ताजा हो रही हैं। चंद्रशेखर के बारे में भाजपा नेता धर्मेंद्र सिंह ने बताया कि बतौर पत्रकार महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के छात्रसंघ उद्घाटन की कवरेज की थी। उन्होंने पहली बार कांग्रेस को ललकारा था। उनका भाषण, मैं देश के हुक्मरानों से कहना चाहता हूँ कि देश की तरक्की का रास्ता खेत खलिहानों और गांव की पगडंडियों से होकर जाता है खूब चर्चित हुआ था। उन्होंने कहा की भारतीय राजनीति के बिरले पुरुष थे चंद्रशेखर।
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पूर्व प्रधानमंत्री और बलिया के पूर्व सांसद चंद्रशेखर जेपी आंदोलन में सत्ता से बगावत कर वह युवा तुर्क कहलाए तो व्यक्तिगत संबंधों को जीवन के साथ जोड़कर चलने की खातिर स्वत: में संस्था थे। 1977 में उम्र कम थी, पहली बार उनका भाषण सुना। छात्र जीवन में उन्हें सुनने की चाहत कोसों यात्रा कराती तो अखबारी जीवन में निकट जाकर कई इंटरव्यू करने का मौका भी मिला। भाषण का वह लय, ताल, विषयों की गहरी जानकारी, समझदारी उनके जीवन का अद्भुत पक्ष था। उनके पड़ोसी जिले घोषी- मऊ के सांसद रहे कल्पनाथ राय को राजनीतिक षड्यंत्र के तहत टाडा का मुकदमा दर्ज हुआ, और उन्हें तिहाड़ जेल में डाल दिया गया, चंद्रशेखर ही थे जो तिहाड़ जेल पहुंचे, मीडिया को बयान दिया, कल्पनाथ चाहे जो कुछ हो सकते हों पर राष्ट्रद्रोही नहीं।
भाषणों में गरीबी और हुनर का समावेश
व्यवसायी सिद्धनाथ सिंह कहते हैं कि चंद्रशेखर के भाषणों में गांव की गरीबी, यहां के परंपरागत हुनर का अक्सर ही समावेश होता। उनके चिंतन का आधार स्वदेशी था। मत भिन्नता के बाद भी वह पंडित दीनदयाल के चिंतन को ही महत्व देते थे। चंद्रशेखर के करीबी रहे सिद्धनाथ सिंह ने बताया कि स्वदेशी के मुद्दे पर वह अटल जी के साथ खडे़ होने में गुरेज नहीं करते। ध्यान आता है जब चंद्रशेखर अपनी सरकार का त्यागपत्र सौंपने जा रहे थे। कांग्रेस के समर्थन वापसी पर पुनर्विचार के लिए राजीव गांधी ने उनकी ओर एक चिट बढ़ायी जिसे अस्वीकार कर दिया।
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चलते चलते जमात बना लेते थे चंद्रशेखर
सपा एमएलसी शतरुद्र प्रकाश कहते हैं कि चंद्रशेखर जी की खासियत थी कि वह चलते-चलते ही जमात बना लेते थे। राजनीति में अकेले ऐसे व्यक्ति थे जो स्वाभिमानी बहुत थे। जिन्होंने कभी सरकार के सामने कोई समझौते वाली बात नहीं की। जरूरत पड़ी तो उन्होंने अपनी सरकार भी कुर्बान कर दी। 1991 में राजीव गांधी ने जब आरोप लगाया कि हरियाणा के दो सिपाही उनकी मुखबिरी कर रहे है तो चंद्रशेखर ने लोकसभा में अपना इस्तीफा दे दिया। जबकि कांग्रेस के समर्थन की सरकार चल रही थी और अपना इस्तीफा लेकर राष्ट्रपति के पास पहुंचे। इमरजेंसी में भी उन्होंने जो जेल से है डायरी लिखी है वह बेमिसाल है। पुण्यतिथि पर उन्हें शत शत नमन।
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