सपा ने कांग्रेस से गठबंधन कर उसे भाजपा के गढ़ में अकेले जूझने के लिए धकेल दिया है। वहीं कांग्रेस को चुनाव लड़ने के लिए जिताऊ उम्मीदवार ही नहीं मिल रहे हैं। जिले की कुल आठ में से कांग्रेस को फिलहाल मिली तीन सीटों में से दो शहर की हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में आने वाली पांच सीटों में से तीन कैंट, शहर उत्तरी और शहर दक्षिणी भाजपा का गढ़ मानी जाती हैं। जिला कमेटी ने इन सीटों के लिए उम्मीदवारों के पैनल में जो नाम भेजे हैं, वह प्रभावशाली नहीं माने जा रहे हैं। इस बीच शहर उत्तरी सीट को लेकर गठबंधन में पेंच फंसा हुआ है।
कैंट सीट से पूर्व सांसद और पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. राजेश मिश्र के चुनाव लड़ने की चर्चा थी। अब पता चला है कि जिला कमेटी की ओर से उनका नाम ही नहीं भेजा गया है। कहा जा रहा है कि वह दिल्ली या लखनऊ से खुद को उम्मीदवार घोषित कराने की कोशिश में हैं।
पार्टी का निर्देश मिलने पर वह शहर की किसी भी सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। कैंट सीट से ही पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पौत्र विभाकर शास्त्री का नाम भी चल रहा है।
शहर दक्षिणी सीट से पं. कमलापति त्रिपाठी के पौत्र राजेशपति त्रिपाठी को चुनाव लड़ाने की योजना थी लेकिन उन्होंने चुनाव में लड़ने से इन्कार कर दिया है। इसके चलते यहां कांग्रेस के समीकरण अभी स्पष्ट नहीं है। बता दें कि सबसे पहले इस सीट से कांग्रेस की सीएम पद के चेहरा रहीं शीला दीक्षित का नाम भी चला था।
पिंडरा सीट पर अजय राय की दावेदारी को लेकर कोई संशय नहीं है। वहां से सपा की ओर से घोषित प्रत्याशी ने खुद को चुनावी दौड़ से अलग कर लिया है। दूसरी ओर शहर उत्तरी सीट पर तय होना है कि यहां से सपा या कांग्रेस में से कौन लड़ेगा।