वाराणसी में शुक्रवार को साझा संस्कृति मंच एवं सद्भावना संगम के तत्वावधान में विश्व समन्वय संघ न?
वाराणसी। हिंसा चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अहिंसा से हर बार उसे हारना ही पड़ता है। गांधी ने सत्य और अहिंसा का जो नारा दिया था उस पर विश्वास करना चाहिए। सत्य और विश्वास ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। देश की आजादी के बाद धार्मिक आस्था का नाम देकर लोग दंगे कर रहे हैं और आज भी देश को बांट रहे हैं। पहले कुछ लोग अपनी जातियों को श्रेष्ठ साबित करने की लड़ाई लड़ते थे, अब धर्म के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं।
समाज पर कटाक्ष करता नाटक गांधी ने कहा था का मंचन शुक्रवार को नागरी नाटक मंडली में किया गया। मुख्य पात्र तारकेश्वर पांडेय जो बेलाघाट पश्चिम बंगाल का रहने वाला है, उसके बेटे की एक दंगे में मौत हो जाती है। गांधी उसे दुखी देख एक मुस्लिम बच्चे को गोद लेने की सलाह देते हैं। पांडेय खुद हिंदू होने की बात कहता है। गांधीजी उसे समझाते हैं कि मुस्लिम बच्चे को पालने से ही दो धर्मों के बीच की ये दूरियां मिटेंगी। वह आफ ताब को गोद ले लेता है और मुस्लिम तरीके से ही उसे पालता है। आफ ताब जैसे-जैसे बड़ा होता है कुछ गलत मुस्लिम लोगों के संपर्क में आ जाता है। उनसे प्रभावित होकर वह आंतकी बन जाता है और घर से भाग जाता है। वहां जाकर वह देखता है कि शिया-सुन्नी को मार रहा है। सब धर्म के नाम पर अधर्म की लड़ाई लड़ रहे हैं। समाज में हिंसा फैला रहे हैं, दंगों की हकीकत सामने आने पर वह वापस घर लौट आता है। उसे अपनी गलती का अहसास होता है और सत्य, अहिंसा के प्रति उसका विचार और पुख्ता हो जाता है। उसे समझ आता है कि ये लड़ाई हिंदू, मुस्लिम की नहीं बल्कि इंसानों के गलत विचारों के बीच है, जिसे रोकना चाहिए। नाटक का मंचन साझा संस्कृति मंच एवं सद्भावना संगम के तत्वावधान में विश्व समन्वय संघ नई दिल्ली के कलाकारों ने किया। लेखकर राजेश कुमार, निर्देशक अरविंद सिंह, संगीत प्रसून नारायण और प्रकाश परिकल्पना गोविंद सिंह यादव की रही। नाटक की अवधि करीब 1:30 घंटे थी। कहानी महात्मा गांधी से शुरू होती है।