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काशी में पौधरोपण: 350 बीघा जमीन पर शहरी वन, सप्ताह में 3 बार 45 मिनट की विशेष सिंचाई होगी; जानें पौधों के नाम

Sun, 01 Mar 2026 10:39 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: वाराणसी में 350 बीघा जमीन पर पौधरोपण की शुरुआत हर-हर महादेव के उद्घोष से हुई। महापौर अशोक कुमार तिवारी व नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल लगातार निगरानी करते रहे। बताया कि इससे प्रदूषण पर काफी हद तक लगाम लगेगा।
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सर्टिफिकेट प्राप्त करते हुए महापौर अशोक कुमार तिवारी व नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल। - फोटो : संवाद
काशी ने अब पर्यावरण संरक्षण के मोर्चे पर भी देश में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के तहत जारी ताजा रैंकिंग में वाराणसी ने देश के 131 शहरों को पछाड़ते हुए प्रथम स्थान प्राप्त किया है। 



वर्ष 2017 से 2024 के बीच उपग्रह आधारित आंकड़ों के विश्लेषण से यह साफ हुआ है कि वाराणसी में अति सूक्ष्म कणों (पार्टिकुलेट मैटर 2.5) के स्तर में 45 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। यह सुधार पूरे देश के किसी भी शहर की तुलना में सर्वाधिक है।

महापौर अशोक कुमार तिवारी व नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल ने इस उपलब्धि को काशीवासियों के सहयोग और टीम वर्क का परिणाम बताया है। उन्होंने कहा कि शहर में धूल नियंत्रण के लिए मशीनीकृत सफाई, कचरा प्रबंधन की आधुनिक तकनीक और सीएनजी व इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते चलन ने हवा को शुद्ध बनाने में अहम भूमिका निभाई है। प्रशासन की ओर से प्रदूषण के स्रोतों पर निरंतर की गई निगरानी और 'स्मार्ट सिटी' के तहत लागू किए गए कड़े उपायों से ही यह मुकाम हासिल हो सका है।
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ऐसे होगा पानी का छिड़काव। - फोटो : संवाद
शीर्ष दस शहरों की सूची में वाराणसी भी
वर्ल्ड एमिशन नेटवर्क की रिपोर्ट और 'एनवायर्नमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी लेटर्स' में प्रकाशित शोध के अनुसार, वाराणसी का यह मॉडल अब अन्य प्रदूषित शहरों के लिए एक मिसाल बन गया है। जहां एक ओर देश के कई हिस्सों में प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है, वहीं वाराणसी ने अपनी कार्ययोजना से यह साबित कर दिया है कि संकल्प और सही प्रबंधन से पर्यावरण की चुनौती को मात दी जा सकती है। शीर्ष दस शहरों की सूची में उत्तर प्रदेश के मेरठ और गजरौला ने भी अपनी जगह बनाई है, लेकिन काशी 45 फीसदी सुधार के साथ सबसे आगे है।

काशी की पवित्र धरती पर पर्यावरण संरक्षण की एक अनूठी मिसाल पेश की तैयारी है। नगर निगम द्वारा सुजाबाद डोमरी क्षेत्र में एक विशाल ‘शहरी वन’ का विकास किया जा रहा है। सुजाबाद डोमरी क्षेत्र में 350 बीघा में विकसित होने वाला शहरी वन' न केवल शहर की आबोहवा को शुद्ध करेगा, बल्कि आर्थिक स्वावलंबन का नया मॉडल भी बनेगा। मियावाकी पद्धति और आधुनिक तकनीकों के संगम से एक मार्च को यहां तीन लाख से अधिक पौधों का रोपण कर शहरी वन' का शुभारंभ किया जाएगा । यह परियोजना न केवल गंगा के किनारों को मजबूती देगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक शुद्ध ऑक्सीजन बैंक के रूप में कार्य करेगी।
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पाैधरोपण करतीं महिलाएं। - फोटो : संवाद
एमबीके नामक संस्था से समझौता
सिगरा स्थित नगर निगम के सभागार में शुक्रवार को आयोजित पत्रकारवार्ता में ये जानकारी महापौर अशोक कुमार तिवारी व नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल ने संयुक्त रूप से दी। उन्होंने बताया कि इस प्रोजेक्ट के लिए मध्यप्रदेश की एमबीके नामक संस्था से एक समझौता किया गया है जो तीसरे वर्ष से ही निगम को दो करोड़ रुपये देगी । वहीं सातवें वर्ष तक पहुंचते-पहुंचते सात करोड़ रुपये वार्षिक तक होने की संभावना है।  

यहां मियावाकी तकनीक के साथ-साथ औषधीय पौधों (आयुर्वेद) और फूलों की खेती का भी अनूठा संगम देखने को मिलेगा। यह केवल एक बगीचा नहीं, बल्कि एक आत्मनिर्भर इको-सिस्टम है। यहां मियावाकी वन के साथ-साथ फलों के बाग, आयुर्वेद की खेती और फूलों की खेती का अद्भुत समन्वय है।

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पुरुषों और महिलाओं ने दिखाया उत्साह। - फोटो : संवाद
स्मार्ट सिंचाई: भीषण गर्मी (मार्च-जून) में पौधों की प्यास बुझाने के लिए सप्ताह में तीन बार 45 मिनट की विशेष सिंचाई का शेड्यूल तय किया गया है।

विविधता: इस वन में बाँस, कचनार, महुआ, और हरसिंगार जैसे कुल 27 प्रकार के देशी पेड़ शामिल हैं।

आर्थिक लाभ: परियोजना के तीसरे वर्ष आम, अमरूद, पपीता, अनार जैसे फलदार पेड़ो और अश्वगंधा, शतावरी, गिलोय और एलोवेरा जैसे औषधीय पौधों तथा गुलाब, चमेली और पारिजात (हरसिंगार) के फूलों से राजस्व मिलना शुरू हो जाएगा। ऐसे में तीसरे वर्ष निगम को दो करोड़ रुपये मिलेगा। वहीं, पांचवें वर्ष पांच करोड़, छठे वर्ष छह करोड़ तथा सातवें वर्ष तक सात करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। सिंचाई के लिए यहां पांच बोरवेल स्थापित किए गए हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि भीषण गर्मी (मार्च-जून) के दौरान भी पौधों को सप्ताह में 3 बार उचित नमी मिलती रहे।
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तीन लाख पौधरोपण करके गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज। - फोटो : संवाद
मार्च में ही परियोजना का शुभारंभ क्यों
विशेषज्ञों के मुताबिक मार्च का प्रथम सप्ताह इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए सबसे अनुकूल है। इसके पीछे कई वैज्ञानिक और भौगोलिक कारण हैं। मानसून आने से पहले पौधों को रोपित करने से उनकी जड़ों को जमने का पूरा समय मिल जाता है, जिससे उनके जीवित रहने की दर (Survival Rate) काफी बढ़ जाती है।

मिट्टी का कटाव: गंगा तट पर स्थित होने के कारण यहां मिट्टी के कटाव का खतरा रहता है। बरसात से पहले फैली जड़ें मिट्टी को बांधकर कटाव रोकने में सुरक्षा चक्र का काम करेंगी। अप्रैल-मई की भीषण गर्मी शुरू होने से पहले पौधे नए वातावरण में ढल जाते हैं। यहां शीशम और अर्जुन जैसी प्रजातियों को प्राथमिकता दी गई है, जो नदी किनारे के वातावरण और अस्थायी जलभराव को सहने में सक्षम हैं।
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काशी में वृहद पाैधरोपण। - फोटो : संवाद
आंकड़ों में  परियोजना की एक झलक
  • पाइपलाइन का जाल: 10,827 मीटर
  • आधुनिक सिंचाई: 360 रेन गन स्प्रिंकलर
  • कुल अनुमानित आय: 19.80 करोड़ रुपये  (5 वर्षों में)
  • सिंचाई नेटवर्क 10827  मीटर पाइपलाइन और 10 बोरवेल
  • तकनीकी उपकरण 360 तक 'रेन गन' स्प्रिंकलर सिस्टम
  • चार किलोमीटर पाथवे
  • अनुमानित राजस्व 19.80 करोड़ (पांच वर्षों में)
 
 
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पौधे की श्रेणी का मुख्य विवरण

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स्कूली छात्राएं भी रहीं आगे, किया पाैधरोपण। - फोटो : संवाद
1. छायादार और वन प्रजातियां
  • शीशम: 35,171
  • सागौन: 14,371
  • अर्जुन: 13,671
  • सप्तपर्णी: 13,071
  • बांस: 12,371
  • पीपल: 11,421
  • महुआ: 10,771
  • शीशम (हाइब्रिड): 14,071
  • महोगनी: 11,021
  • बकैन: 9,971
  • चिलबिल: 8,371
  • कैजुराइना/झाऊ: 7,371
  • चितवन: 6,071

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पाैधरोपण कार्यक्रम में बढ़-चढ़ कर लिया हिस्सा। - फोटो : संवाद
2. फलदार वृक्ष
  • अमरूद: 24,121
  • आम: 19,421
  • अनार: 14,771
  • शहतूत: 12,771
  • नींबू: 10,371
  • करौंदा: 8,071
  • बेल: 3,971
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पीएसी जवानों ने भी किया पाैधरोपण। - फोटो : संवाद
3. फूलों वाले और सजावटी पौधे
  • कचनार: 11,771
  • चांदनी: 9,371
  • गुड़हल: 9,071
  • हरसिंगार/पारिजात: 7,771
  • बोतल ब्रश: 7,071
  • मनोकामिनी: 6,371
  • एलिका: 4,821
  • जंगल जलेबी: 7,022
  • कुल योग: 3,17,120
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