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पितृपक्ष में होगा हाईटेक तर्पण: एनआरआई घर बैठे कराएंगे पितरों का श्राद्ध, 5100 से 51000 रुपये तक के पैकेज

Thu, 24 Sep 2026 01:56 PM IST
Pragati Chand अभिषेक सेठ, संवाद न्यूज एजेंसी, वाराणसी।

सार

काशी में पितृपक्ष में हाईटेक तर्पण होगा। इसके तहत एनआरआई 5100 से 51000 रुपये में पूर्वजों का ऑनलाइन श्राद्ध कराएंगे। तर्पण कराने वालों ने इसके लिए अलग-अलग पैकेज लिए हैं। 
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काशी में पितरों का तर्पण हुआ डिजिटल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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काशी में पितरों का तर्पण अब डिजिटल हो रहा है। हाथ में कुश, तिल और गंगाजल के साथ अब कर्मकांडी ट्राइपॉड और स्मार्टफोन के माध्यम से ई-तर्पण करा रहे हैं। विदेश में बैठे अप्रवासी भारतीय (एनआरआई), जो व्यस्तता या वीजे की अड़चनों के चलते यहां नहीं आ पा रहे हैं, अब घर बैठे विदेश से ही वीडियो कॉल पर पूर्वजों का तर्पण कराएंगे। 

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पितृपक्ष के मौके पर काशी के कर्मकांडी ब्राह्राण ई-पिंडदान के लिए बाकायदा 5,100 रूपये से लेकर 51,000 रुपपये तक ले रहे हैं। इसके अलावा हजारों लोग ऑनलाइन एप से भी पिंडदान करा रहे हैं। तर्पण कराने वालों ने इसके लिए अलग-अलग पैकेज लिए हैं। अमेरिका, जापान, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, सिडनी, स्पेन में रहने वाले एनआरआई अभी से ही ब्राह्मणों के संपर्क में हैं। 

20 फीसदी विदेशी करा रहे ऑनलाइन त्रिपिंडी
गुड़गांव, नोएडा, बंगलूरू, हरियाणा की कई कंपनियां ऑनलाइन एप और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों से संपर्क साध रही हैं। त्रिपिंडी तर्पण के लिए वह हजारों रुपये चार्ज कर रही हैं। एप डाउनलोड करने के बाद ग्राहकों को कॉल करके तरह-तरह के ऑफर दिए जा रहे हैं। गुड़गांव से एक एप पर काम कर रहे सेल्स हेड चेतन पांडेय ने बताया कि उनके पास अभी तक ऑनलाइन त्रिपिंडी के लिए 100 से अधिक बुकिंग हो चुकी है। इनमें करीब 20 फीसदी एनआरआई हैं। अलग-अलग तारीखों पर लोग गया, काशी और हरिद्वार में अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए त्रिपिंडी करा रहे हैं। गूगल मीट एप से लोगों को जोड़कर ऑनलाइन संकल्प दिलाया जाएगा।

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प्राचीन काल में ऑनलाइन की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। समय के साथ परिवर्तन हो रहा है। यदि कोई यजमान आने की स्थिति में नहीं है, लेकिन वह शुद्ध मन और पवित्रता से संकल्प लेकर पितरों का तर्पण कराता है, तो इसका भी फल उसे उतना ही मिलेगा जितना भौतिक रूप से उपस्थित होकर मिलता है। कुछ न करने से किसी प्रकार से पितरों को याद करना अच्छा है। -प्रो. रामनारायण द्विवेदी, महामंत्री, काशी विद्वत परिषद 
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