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पितृ अमावस्या पर 38 साल बाद बन रहा सूर्य संक्रांति का संयोग

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वाराणसी। पितृ अमावस्या पर 38 साल बाद सूर्य संक्रांति का संयोग बन रहा है। उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में सूर्य-चंद्रमा के होने से इस बार श्राद्ध का विशेष संयोग रहेगा। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि जब सूर्य कन्या राशि में हों, तब श्राद्ध करने से पितर पूरे साल तक संतुष्ट हो जाते हैं।
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काशी विद्वत परिषद के मंत्री डॉ. रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि 17 सितंबर को सर्व पितृ अमावस्या पर ग्रह-नक्षत्रों का शुभ योग बन रहा है। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पितृपक्ष में कन्या राशि में सूर्य होने से यह पक्ष अत्यंत पुण्य वाला होता है। लेकिन इस वर्ष कन्या राशि के सूर्य का संयोग पितृपक्ष में 15 दिन प्राप्त नहीं हुआ। केवल सर्व पितृ अमावस्या को ही कन्या राशि का सूर्य मिल रहा है। इसलिए इस दिन श्राद्ध अत्यंत पुण्यदायी होगा। ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र ने बताया कि इससे पहले ये संयोग 1982 में बना था। सर्व पितृ अमावस्या पर सभी पितरों के लिए श्राद्ध और दान किया जाता है। वायु रूप में धरती पर आए पितरों को इसी दिन विदाई दी जाती है।
अमावस्या और पितरों का संबंध
सूर्य की हजारों किरणों में जो सबसे खास है, उसका नाम अमा है। उस अमा नाम की किरण के तेज से ही सूर्य धरती को रोशन करता है। जब उस अमा किरण में चंद्रमा वास करता है यानी चंद्रमा के होने से अमावस्या हुई, तब उस किरण के जरिए चंद्रमा के ऊपरी हिस्से से पितर धरती पर आते हैं। इसीलिए श्राद्ध पक्ष की अमावस्या तिथि का विशेष महत्व है।
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तिलांजलि के साथ विदा होंगे पितर
पद्म, मार्कंडेय और अन्य पुराणों में कहा गया है कि अश्विन महीने की अमावस्या पर पितृ पिंडदान और तिलांजलि चाहते हैं। उन्हें यह नहीं मिलता तो वे अतृप्त होकर ही चले जाते हैं। इससे पितृदोष लगता है। मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करने के बाद भी अमावस्या पर जाने-अनजाने में छूटे हुए सभी पीढ़ियों के पितरों को श्राद्ध के साथ विदा करना चाहिए। इसी को महालया श्राद्ध कहा जाता है।
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