वाराणसी। तीन सौ साल पुराने जलोत्सव बुढ़वा मंगल के राग-रंग, बनारसी ठाठ और मस्ती की साक्षी मंगलवार की रात अस्सी घाट की वही सीढि़यां बनीं, जो कुछ महीने पहले तक सिल्ट के ढेर के नीचे गुम थी। विदेशी पर्यटकों और संगीत रसिकों ने आधी रात तक ठुमरी, दादरा, होरी, चैती की धुनों का लुुत्फ लिया और वाहवाही की।
कुर्ता-पायजामा और दुपलिया टोपी में सजे रसिकों पर लगातार चैती गुलाब की पंखुडि़यां की वर्षा होती रही। जैसे-जैसे रात ढलती गई, बुढ़वा मंगल जवान होता गया।
चैत की आलस छोड़ शहर के संगीत रसिक बन-ठन कर अस्सी घाट पहुंचने लगे। फूलों के गजरों और हरी पत्तियों से सजे 18 बजरों पर बिछी चांदनी -मसनद पर आकर अपना स्थान लेते रहे। कोई आकर इत्र छिड़कने लगता, कोई गुलाबी दुपट्टा ओढ़ा जाता तो कोई गुलाल के टीके लगा देता था।
धीरे-धीरे बुढ़वा मंगल जब जवान होने लगा तो रात करीब आठ बजे मोहन त्यागी ने शहनाई की मंगलध्वनि छेड़ दी। लहरों के साथ सुरों की अटखेलियों के सिलसिले को गायिका सोमा घोष ने आगे बड़ाया। रसिया ‘आज बिरज में होरी रे रसिया’ के बाद काफी में होरी ठुमरी ‘जनि मारो पिचकारी कन्हैया मैं दूंगी गारी’ सुनाकर फागुनी माहौल बनाया और फिर बसंत के उत्तरार्ध के गीत चैती सुनाया।
समापन ठुमरी ‘आज की रात मानो संवरिया’ से उन्होंने विदा ली। इनके बाद गिरिजा देवी की शिष्या रीता देब ने ठुमरी ‘इयां बुलावे आधी रात’ के बाद होरी ‘कन्हैया घर‘चलो गुइयां आज खेले होरी’ सुनाया तो श्रोताओं हर हर महादेव का घोष कर उनका हौसला बढ़ाया।
तबले पर पं. कुबेर नाथ मिश्र, हारमोनियम पर जमुना वल्लभ दास गुजराती, सारंगी पर पं.संतोष मिश्र ने संगत की। संचालन प्रवीण ने किया। इससे पहले मंडलायुक्त आरएम श्रीवास्तव, डीएम प्रांजल यादव ने दीप जलाकर उद्घाटन किया। धन्यवाद क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र प्रमुख डॉ.रत्नेश वर्मा ने दिया।