महालया पर शुक्रवार को ध्वजा, पताका सजाकर पितरों की याद में पिंडदान किया गया। पितरों के प्रसन्न करने के लिए पिंडदान के लिए वंशजों की भीड़ उमड़ पड़ी। पिशाच मोचन (बिमल कुंड)पर मेले जैसा माहौल बन गया। पूर्वजों के स्मरण के लिए मणिकर्णिका तीर्थ, धर्मकूप पर भी हजारों लोग पहुंचे। शनिवार से पितृपक्ष आरंभ हो जाएगा।
अकाल मौत के बाद प्रेतयोनि में भटकती आत्माओं की शांति के लिए पिशाचमोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए जगह-जगह वंशजों का जमावड़ा हुआ। तिल, जौ, अक्षत और खोवा से पिंड बनाकर श्राद्ध किया गया। महालया पर सबसे अधिक भीड़ यहां उमड़ी। वंशजों ने पितरों की याद में तर्पण-अर्पण भी किया। तीन वेदियों पर ध्वजा, पताका और कलश रखकर श्राद्ध किया गया। पिशाच मोचन कर प्रेतात्माओं को शांत करने के लिए प्रेत कुंड में पिंडदान के बाद कील भी ठोंकी गई। तीर्थ पुरोहित कृष्ण कुमार उपाध्याय ने बताया कि बिमल तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध पिशाच मोचन कुंड प्रथम श्राद्ध भूमि है। यहां अकाल मौत मरने वालों को पिंडदान के बाद मोक्ष मिलने की मान्यता है। दुनियाभर से लोग यहां पहुंचेंगे।