भारत रत्न पंडित रविशंकर की संस्था रिंपा की संगीत मंच की साज बड़ी दूर तक सुनाई देती थी। देश भर में डंका बजा करता था। 100-100 रुपये के टिकट पर श्रोता संगीत की प्रस्तुतियां देखने जाते थे। सेंट्रल हिंदू स्कूल में होने वाली यह परंपरा 21वीं सदी के आने से पहले ही टूट गई और अब तो इसकी यादें भी बिखर चुकी हैं।
काशीराज की परंपरा रही कि वो किसी के घर नहीं जाते। चेत सिंह, नागरी प्रचारिणी या नाटी इमली सहित लक्खा मेला न हो तो। एक बार वह तुलसीघाट के कार्यक्रम में पहुंचे तो मेरे मन मुख से निकला गया कि राज हठ में बार-बार आग्रह पर आप नहीं आते थे। मेरी ओर देखकर बोले कि मंच पर ऋग्वेद की ऋचाओं को गाकर सुनाओ। ऋग्वेद के दुर्गम संस्कृत शब्दों को स्वरों में ढालना महादुर्गम था मगर उच्चारण हुआ और ऋचाएं सुनाईं।
बीते 25 साल में मोबाइल और मोबाइल के चलते ही सब बड़े बदलाव हम मानते हैं। लेकिन साल 1998 में 20-25 साल आगे यानी कि आज की दुनिया दिख गई। उस दौर में बनारस में मोबाइल रखना स्टेटस सिंबल था। एक शांत बरात जा रही थी। अर्थात बरातियों में कोलाहल ही नहीं था। लेकिन वे सभी जितने धनी थे उससे कम मुलम्मा भी नहीं थे। खैर शांति का जड़ था मोबाइल। हर बराती अपने-अपने मोबाइल से बात कर रहा था। तब देखकर एहसास हुआ कि बनारस बदल रहा है और आज भी वही महसूस होता रहता है। -पंडित राजेश्वर आचार्य, शास्त्रीय गायक, पद्मश्री, पूर्व अध्यक्ष उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी