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25 दिन 25 कहानियां: मंदिर के बाहर गिरा बटुआ, लौटाते वक्त आवाज आई- हम भिखमंगा हई, चोर-ऊचक्का नाहीं...

Mon, 18 May 2026 02:32 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: रुद्र काशीकेय, धर्मशील चतुर्वेदी, भानुशंकर मेहता और बीएचयू के प्रोफेसरों सहित 40 बड़े साहित्यकार इसमें सदस्य हुआ करते थे जो हर वर्ष किसी न किसी को ठलुआ की उपाधि दिया करते थे। अब 15-20 साल पहले उसने भी सक्रियता भरा साथ छोड़ दिया।
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पंडित राजेश्वर आचार्य - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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2003 में लगातार 52 घंटे संगीत-पेंटिंग की जैमिंग चली। मेरे आमंत्रण पर कोलकाता से मशहूर चित्रकार अमित चक्रवर्ती आए। राम नवमी पर भगवान रघुकुल पर 118 माइक्रो पेंटिंग उकेर डाली। इसका पारिश्रमिक तो छोड़ो वह बिना सोये, खाये-पीये ही चित्रकारी करते रहे।

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शहर के क्लब में सबसे यशस्वी रहा 86 साल पहले मेरे आसपास के दिनों में ही जन्मा काशी का ठलुआ क्लब। एकदम प्योर बनारसी फक्कड़ ग्रुप। रुद्र काशीकेय, धर्मशील चतुर्वेदी, भानुशंकर मेहता और बीएचयू के प्रोफेसरों सहित 40 बड़े साहित्यकार इसमें सदस्य हुआ करते थे जो हर वर्ष किसी न किसी को ठलुआ की उपाधि दिया करते थे। अब 15-20 साल पहले उसने भी सक्रियता भरा साथ छोड़ दिया। कभी महादेवी वर्मा का सम्मान करने वाला यह क्लब 2003 में मेरा अभिनंदन करने जुट गया। मुमुक्षु भवन में ले जाकर सब्जियों की माला पहनाकर सम्मानित कर दिया गया।

चकाचौंध में तो काशी की खूब तरक्की हुई। अब आध्यात्म से जुड़े बाजार वाले भी मालामाल हैं। कुछ खल रहा है तो वो है काशी की भलमनसी और नेक नियति। काशीवासी तब मंदिरों में विज्ञापन नहीं आत्म प्रज्ञापन करके बाहर निकलते थे। एक बार रेणुका मंदिर के बाहर बैठे भिखारी के बगल रुपयों से भरा बटुआ गिर गया तो वह उसे उठाकर तुरंत उसी भक्त को वापस दे आया। भौचक्का भक्त बोल पड़ा, अरे तुम तो भिखारी हो न बे, तो इसे क्यों नहीं रख लिए। वो चिढ़कर बोला, हम भिखमंगा हई, चोर-ऊचक्का नाहीं, औकात में रहा। इस शहर ने भिखारियों में गैरत, मर्यादा और प्रतिष्ठा का रंग भर डाला था। जिस तरह आज मंदिरों में गुप्त दान करते हैं तब बिना प्रचार के काम करने का चलन था। मंदिर में संगीत का कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। आज भगवान के यहां भजन गाने आए हैं बस। मैं नहीं हम-हम शब्द ही कहा करते थे।
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इसकी एक बानगी तुलसीघाट पर देखिए। 2003 स लगातार 52 घंटे संगीत-पेंटिंग की जैमिंग चली। मेरे आमंत्रण पर कोलकाता से मशहूर चित्रकार अमित चक्रवर्ती आए। राम नवमी पर भगवान रघुकुल पर 118 माइक्रो पेंटिंग उकेर डाली। इसका पारिश्रमिक तो छोड़ो वह बिना सोये, खाये-पीये ही चित्रकारी करते रहे। यही बात कबीरचौरा वाली सांगीतिक थातियों में भी लागू हो जाती थी। वाद्य-गायन की कोई तकनीक सीखना हो तो बस पैर छूकर ही काम चल जाता था।

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भारत रत्न पंडित रविशंकर की संस्था रिंपा की संगीत मंच की साज बड़ी दूर तक सुनाई देती थी। देश भर में डंका बजा करता था। 100-100 रुपये के टिकट पर श्रोता संगीत की प्रस्तुतियां देखने जाते थे। सेंट्रल हिंदू स्कूल में होने वाली यह परंपरा 21वीं सदी के आने से पहले ही टूट गई और अब तो इसकी यादें भी बिखर चुकी हैं।

काशीराज की परंपरा रही कि वो किसी के घर नहीं जाते। चेत सिंह, नागरी प्रचारिणी या नाटी इमली सहित लक्खा मेला न हो तो। एक बार वह तुलसीघाट के कार्यक्रम में पहुंचे तो मेरे मन मुख से निकला गया कि राज हठ में बार-बार आग्रह पर आप नहीं आते थे। मेरी ओर देखकर बोले कि मंच पर ऋग्वेद की ऋचाओं को गाकर सुनाओ। ऋग्वेद के दुर्गम संस्कृत शब्दों को स्वरों में ढालना महादुर्गम था मगर उच्चारण हुआ और ऋचाएं सुनाईं।

बीते 25 साल में मोबाइल और मोबाइल के चलते ही सब बड़े बदलाव हम मानते हैं। लेकिन साल 1998 में 20-25 साल आगे यानी कि आज की दुनिया दिख गई। उस दौर में बनारस में मोबाइल रखना स्टेटस सिंबल था। एक शांत बरात जा रही थी। अर्थात बरातियों में कोलाहल ही नहीं था। लेकिन वे सभी जितने धनी थे उससे कम मुलम्मा भी नहीं थे। खैर शांति का जड़ था मोबाइल। हर बराती अपने-अपने मोबाइल से बात कर रहा था। तब देखकर एहसास हुआ कि बनारस बदल रहा है और आज भी वही महसूस होता रहता है। -पंडित राजेश्वर आचार्य, शास्त्रीय गायक, पद्मश्री, पूर्व अध्यक्ष उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी 
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