झारखंड से पंजाब तक ऐसे पहुंचता था डोडा-अफीम
पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि पिंटू और सत्यपाल पलामू के किसानों से डोडा-अफीम खरीदते थे। वह खुद भी अफीम (पोस्त) की खेती करते थे। पोस्ता का दूध निकालकर उसे अफीम की शक्ल दी जाती थी। वहीं पोस्ता की सूखी फली (डाेडा) को भी तस्करी के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इसकी डील डाल्टेनगंज में की जाती थी। किसानों से 200 रुपये किलो डोडा और तीन हजार रुपये किलो अफीम खरीदने के बाद चारों मिलकर पंजाब में 1500 रुपये किलो की दर से डोडा और डेढ़ लाख रुपये किलो की दर से अफीम बेचते थे। मुनाफे को आपस में बांट लेते थे।
ढाई लाख में पिंटू ने उपलब्ध कराई थी 2.25 कुंतल डोडा और तीन किलो अफीम
पंजाब के लुधियाना निवासी आरोपियों की 28 मई को पिंटू से बात हुई थी। इसके बाद वह झारखंड के डाल्टेनगंज के लिए रवाना हुए थे। 31 मई को वह डाल्टेनगंज पहुंचे। वहां पारकर पंकी रोड स्थित पेट्रोल पंप के पीछे वाले रोड पर अपनी बोलेरो खड़ी की। वहां से पिंटू ने उन्हें अपने गाड़ी में ले लिया। उन्होंने पिंटू को ढाई लाख दिए। इसके कुछ देर बाद अफीम और डोडे की खेप लाकर बोलेरो में लाद दी गई।
छह महीने से हो रहा सोनभद्र के रूट का इस्तेमाल
डोडा-अफीम के लिए रोहित और प्रिंस छह माह से सोनभद्र के रूट का इस्तेमाल कर रहे थे। पूछताछ में खुद यह जानकारी प्रिंस ने दी थी कि वह स्वयं तीन बार सोनभद्र होते हुए इसकी खेप ले जा जा चुका है। लुधियाना में वह इसे ट्रक वालों को उपलब्ध कराते थे। जब मादक पदार्थ खत्म हो जाता, तब पिंटू और उसके जरिए सत्यपाल से संपर्क कर मंगा लिया जाता। आरोपियों ने दावा कि पंजाब में ज्यादातार लोग डोडा और अफीम खाते हैं। अफीम महंगी है इसलिए उसे हर कोई नहीं ले पाता। इसके लिए नशे की तलब रखने वाले लोग डोडा को ज्यादा तरजीह देते हैं। लुधियान में अफीम 7500 की 50 और डोडा 1500 रुपये किलो आसानी से बिक जाता है।