घर-घर पान की डलिया, पीकदान और संयुक्त परिवार की अलग संस्कृति थी। किसी न किसी सदस्य की जिम्मेदारी पीकदान को राख से रगड़कर चमकाने की होती थी। चुनटदार अद्धी, मलमल का कुर्ता और बेफिक्र चाल बनारसी जीवनशैली का हिस्सा थे। दालमंडी से गुजरते हुए कोठों से घुंघरू, तबले और सारंगी की आवाज सुनाई देती थी। हर मोहल्ले की अपनी पहचान थी... लोहटिया, दलहट्टा, हड़हासराय और चौक, सबकी अलग पहचान और किस्से थे।
गंगा किनारे जीवन और भी धीमा और सुंदर था। नाविक और सवारी के बीच कुछ ही देर में अपनापन बन जाता। उनकी बातों में दर्शन भी होता और हास्य भी। यही बनारस था...धीमा, गहरा और आत्मीय। 25 साल पहले की काशी में भागदौड़ कम थी, जीवन में ठहराव ज्यादा। शहर चलता कम था, बहता ज्यादा था-ठीक मां गंगा की धारा की तरह।