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सोनल मानसिंह की ओडिसी की थिरकन का चला जादू

Tue, 20 Dec 2016 02:10 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/वाराणसी
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बीएचयू में नृत्य प्रस्तुत करतीं सोनल मानसिंह।
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राष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सव की सोमवार की शाम चोटी के कलाकारों की संगीत साधना के नाम रही। ओडिसी नृत्यांगना पद्मभूषण सोनल मानसिंह ने जहां भावों-इशारों के अनूठे लोच से थिरकन का जादू चलाया, वहीं पद्मश्री पं. भजन सोपोरी और अभय रुस्तम सोपोरी ने संतूर के तारों पर स्वरों के समन्वय और छंदों के प्रयोग से दिल जीत लिया। पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र ने रागों की खनक और खासियतों का नायाब गुलदस्ता सजाया। बनारस घराने के तेरवट और चतुरंग की बंदिशें महामना की बगिया में सांस्कृतिक पटल पर छाए लघु भारत की छटा में चार चांद सरीखी छा गईं। 
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बीएचयू के पं. ओंकार नाथ ठाकुर प्रेक्षागृह में कुलपति प्रो. जीसी त्रिपाठी ने दीप जलाकर कार्यक्रम का उद्घाटन किया। शुरुआत हुई सोनल मानसिंह के ओडिसी नृत्य से। सोनल ने ओडिसी नृत्य में ‘कृष्ण यात्रा’ को बेजोड़ तरीके से कंपोज किया था। शंखध्वनि से ध्यान मग्न मुद्रा में मंच पर पहुंचीं ओडिसी नृत्यांगना ने सिद्ध कमला कुच मंडल जय देव हरे... की बंदिश पर थिरकना शुरू किया।

उन्होंने मथुरा की जेल में कृष्ण जन्म के बाद वसुदेव के अंधेरी रात में बालक को लेकर यमुना पार गोकुल पहुंचने और वहां से योगमाया के रूप में यशोदा की कोख से जन्मी योगमाया को लेकर जेल आने तक के प्रसंग को संजीदगी से नृत्य में संजोया। अघासुर, बकासुर, पूतना और कालियानाग जैसे कंस की सेना के धुरंधरों के वध से लेकर गोपी-उद्धव संवाद और कृष्ण-सुदामा मिलन के भावों पर उनके नृत्य का कोई सानी नहीं था। 
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इनके बाद पं. भजन सोपोरी और उनके पुत्र अभय रुस्तम ने संतूर पर राग मारवा की अवतारणा की। अलाप, जोड़, झाला के बाद पखावज अंग में छंदों पर गतकारी की। इनके बाद पं. छन्नूलाल मिश्र ने बनारस घराने की संगीत की खूबियों से परिचित कराया। उन्होंने शुरुआत की शक्ति आराधना से। राग हंसध्वनि में बंदिश के बोल थे- जय मातु विलंब तजि दे...। झप ताल में दूसरी बंदिश थी- जय शिवशंकर अवढरदानी...।

इसके बाद बनारस घराने की पुरानी चीजों में तेरवट और चतुरंग पेश कर उन्होंने संगीत प्रेमियों को मुग्ध किया। उन्होंने राग मिश्र खमाज में बनारसी ठुमरी प्रस्तुत की। बोल थे- अब ना बजाओ श्याम बंसुरिया...। इसके बाद दादरा- जिया मोरा ना लागे बैरी बलमुआ... और अंत में भजन- रघुवर तुमको मेरी लाज... से उन्होंने विराम लिया। तबले पर पं. राम कुमार मिश्र, हारमोनियम पर पं. विजय कपूर, तानपूरे पर अमन जैन, मोहिनी मिश्रा ने संगत की। संचालन किया प्रतिमा सिन्हा ने। 
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