घाव दर्द देता है और उसका दाग सालता है। बरसों का दर्द था उन चेहरों पर। खुद को कमतर मान चुके थे लेकिन, आज उनके चेहरे की खुशियां फिजा में किसी इत्र की माफिक महक रही थीं। मन बल्लियों उछल रहा था और सालों से बहते आंसुओं के स्याह दाग उजले हो गए थे।
देश के मुखिया ने उन्हें रास्ता दिखाया, उस पर चलने का सहारा दिया तो खुशी के साथ-साथ विकलांगों के मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा भर उठा। पांडेयपुर के मुकेश पैरों से विकलांग हैं। विकलांगता का दर्द शब्दों के धागों से बुन पाना मुमकिन नहीं। कभी हमदर्दी तो कभी सहारे की तलाश में उनका खुद्दार मन कई बार रोया लेकिन शुक्रवार को जब सामाजिक अधिकारिता शिविर में उन्हें कृत्रिम पैर मिला तो उनके सपनों को नए पंख लग गए। जिंदगी का नया हौसला मिल गया। कहा कि, बस अब कुछ करना है, आत्मनिर्भर बनना है।
अब हम अपने स्वाभिमान को चोटिल नहीं होने देंगे। जंसा की शकीला को इस शिविर में ट्राईसाइकल मिला। ट्राइसाइकल मिलते ही जैसे उनका हौसला दूना हो गया। उन्होंने ठान ली कि अब वे अपने हौसलों और अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत खुद अपना रास्ता बनाएंगी। हरहुआ की रेशमा को श्रवण यंत्र मिला। वे अब ठीक से सुन सकेंगी। कहा कि प्रधानमंत्री ने एक नई राह दिखाई है। जीने का साहस दिया है और भरोसा भी। अब पढ़ लिखकर जिंदगी में आगे बढ़ने की ख्वाहिश पूरी करूंगी।