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आयातित चश्मे से न देखें बनारसी जीवन और विकास

Wed, 25 Nov 2015 02:15 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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बनारस की अपनी लय है। इसके जीवन का एक अपना संगीत है। वह संगीत द्रुत नहीं, विलंबित लय पर आधारित है। इसलिए बनारस के वर्तमान से बंधे हुए भविष्य को जापानी चश्मे या आयातित नजरों से नहीं देखा जा सकता।
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 कवि ज्ञानेंद्रपति काशी के विकास के मॉडल पर इसी तरह दो टूक राय रखते हैं। उनके मन में इस प्राचीन शहर के स्थापत्य की भी चिंता है और रोज नंगे पैर धार्मिक, सांस्कृतिक पर्यटन करने वालों की पीड़ा भी।
 उनका कहना है कि इस शहर को क्योटो के मॉडल में फिट करने की अव्यावहारिक सोच पैदा हो रही है, दूसरी ओर घाटों पर गंगा से एकात्मकता का संवाद खत्म हो रहा है। तमाशे बढ़ रहे हैं।
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विकास की बात हो तो इस दौर में धीमे अंदाज वाले इस शहर के लिए मेट्रो रेल नहीं, पहले नंगे पांव चलने वालों के लिए ‘पैदल पथ’ बनाया जाना चाहिए। इससे भीड़ प्रबंधन विकसित होगा।
इस संकरे शहर में साइकिल की वापसी यातायात सुधार का बेहतर माध्यम बन सकती है। बशर्ते लोग इसकी मूल भावना को पहले सोचें, समझें और तब काम करें...।
कंधे पर झोला लटकाए फुटपाथों, रेलवे के प्लेटफार्मों पर बदहाल कुनबों की जिंदगी में कविता की खोजबीन करने वाले कवि ज्ञानेंद्रपति आजकल बनारस के बारे में सोचते फिर रहे हैं।
स्वच्छता अभियान के बहाने बनारस की नई विकास यात्रा पर उनकी पहली कविता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अस्सी घाट पर फावड़ा चलाने के बाद ‘फावड़ा’ शीर्षक से ही आई है।
वह कहते हैं, किसी आदमी का विकास उसकी अपनी प्रकृति की जमीन पर होता है। इसी तरह किसी नगर का विकास वहां की सांस्कृतिक जमीन या प्रवाहमान परंपराओं से बनने वाले धरातल पर। बनारस के विकास के लिए बाहर से कोई मॉडल भेजने का दृष्टिकोण सही नहीं लगता।
वह कहते हैं कि 70 के दशक में पटना छोड़कर बनारस को जीने का फैसला उन्हें यहां की लय से प्रभावित होकर ही करना पड़ा था।
तब अस्सी के खुले बैठकखानों से लेकर गोदौलिया के दी रेस्त्रां की अड़ियों में कवि त्रिलोचन शास्त्री, धूमिल, काशीनाथ सिंह, सुखदेव सिंह जैसे लोगों के बीच बनारसी मस्ती का अंदाज ही निराला था।
तब छायावाद के अंतिम अवशेष के रूप में शांतिप्रिय द्विवेदी भी सड़कों पर घूमते नजर आ जाते थे। उन्हें अब भी याद है कि बनारस के ऐसे ही माहौल का आनंद उन्हें छात्र जीवन में भी यहां खींच लाया करता था।
 18-19 वर्ष की उम्र में ऐसे ही रचनाकारों के साहचर्य में बनारस की सड़कों, गलियों में घूमते हुए फिर इस शहर से प्रेम हो गया। कभी -कभी तो पूरी रात गंगा के किनारे बिता डालते थे।
अभी बनारस का जो परिदृश्य है, उसमें दो स्थितियां दिखाई दे रही हैं। एक तो मॉल जैसी चीजें बन रही हैं, जिससे लगता है महानगरीयकरण हो रहा है।
दूसरी ओर धार्मिक कर्मकांड की राजधानी होने की वजह से गंगा घाटों पर आरती उद्योग तेजी से विकसित हो रहे हैं। उनका नजरिया है कि गंगा तटों पर दृश्यमूलक आयोजन ही नहीं होने चाहिए।
घाटों के विकास के क्रम में हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कुछ लोग गंगा से अकेले में बतियाना चाहते हैं। ऐसे में तीव्र ध्वनि वर्जित और शांत क्षेत्र भी घाटों पर विकसित किए जाने चाहिए।
तब और अब में फर्क भी आ गया है। जो शामें और रातें हमने अपने कवि मित्रों के साथ घाटों पर बिताई हैं। उन रातों का अब परस भी नहीं पाया जा सकता। तब घाटों पर गंगा से एकात्मकता महसूस होती थी। एक संवाद संभव था गंगा से। इतने तमाशे नहीं थे। अब इसके उलट सब कुछ है। गंगा में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है।
अब निर्मलता अतीत की चीज हो गई है। दशाश्वमेध घाट पर आरती तो ठीक है लेकिन घाट-घाट पर इसी तरह के आयोजन हों, तो गंगा से तल्लीन होकर जीने की गुंजाइश नहीं बची रह जाती।
वह बातचीत का ट्रैक बदलते हुए कहते हैं कि बनारस सिर्फ घाटों तक सिमटा नहीं है। स्टेशन से उतरते ही सिर पर गठरी रखकर गीत गाती नंगे पांव चलने वाली महिलाओं की कतारें नजर आती हैं।
 बनारस में मध्य भारत, दक्षिण भारत के अलावा दूसरे राज्यों, इलाकों से आने वाले श्रद्धालु स्टेशन या बस अड्डे से पैदल और नंगे पांव गंगा घाट, विश्वनाथ मंदिर तक चलने की इच्छा रखते हैं।
उनके नंगे पांव चलने के लायक सड़कों को बनाने की भी जिम्मेदारी है। इसके लिए ‘पैदल पथों’ का निर्माण हो। स्थापत्य कला के प्रतीक पुराने मंदिरों, तीर्थों का कायाकल्प होना चाहिए।
  जिस एक बात को लेकर उनको बहुत दुख होता है वह है बनारस की गंदगी। कहते हैं कि स्वच्छ भारत अभियान की इतना चर्चा हो रही है लेकिन सड़कों के किनारे कूड़ेदान की व्यवस्था नहीं है।
नगर निगम अपने कार्यपालन के प्रति उदासीन है। महीने भर पहले संपूर्णानंद स्टेडियम में सीएम के प्रस्तावित आगमन को लेकर बनाई गई सड़कों पर भी गिट्टियां उभरी हुई छोड़ दी गईं।
कोई पूछने वाला नहीं है कि ऐसा क्यों और किसने किया। डिजिटल इंडिया के शोर के जमाने में नगर निगम ऐसा ऐप विकसित करे, जिस पर नागरिक सुविधाओं की बदहाली की तसवीरें भेजी जा सकें। चंडीगढ़ और दिल्ली में ऐसे उपाय काफी कारगर साबित हो रहे हैं।
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