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सराफा कारोबारी के विरुद्ध गैर जमानती वारंट

Thu, 08 Dec 2016 02:02 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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चंडीगढ़ कोर्ट, हाईकोर्ट, अदालत, न्यायालय - फोटो : file photo
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धोखाधड़ी, कूटरचना और आपराधिक षड्यंत्र कर डीआईजी बंगले के क्रय-विक्रय के मामले में सीजेएम अभय श्रीवास्तव की कोर्ट ने बुधवार को कारोबारी आनंद अग्रवाल के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया है। इस संबंध में बीते 12 अक्तूबर 2015 को कैंट थाने में आनंद अग्रवाल समेत सात के खिलाफ शिवपुर निवासी राकेश न्यायिक ने मुकदमा दर्ज कराया था।


कन्हैया स्वर्ण कला केंद्र सहित शहर के कई अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के अधिष्ठाता कैंट के राजा दरवाजा निवासी आनंद अग्रवाल पर आरोप है कि नगर निगम कर्मियों के साथ मिलीभगत कर उन्होंने डीआईजी बंगले का रजिस्टर्ड सट्टा-बैनामा कराया था। इस मामले में आनंद अग्रवाल के साथ ही बिहार के दरभंगा के काशीपुर की जनक नंदनी कुंवर, अस्सी निवासी अमरेश्वरी प्रसाद नारायण सिंह, त्रिविक्रम नारायण सिंह, शंभू प्रसाद, शिवनंदन सिंह और सत्यनारायण सिंह भी आरोपी हैं। मामला प्रकाश में आने पर शिवपुर निवासी राकेश न्यायिक ने कैंट थाने में मुकदमा दर्ज कराया।
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इस मामले में अदालत ने बीते दिनों आनंद अग्रवाल के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया था। जिस पर आनंद अग्रवाल ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की और उसका हवाला देकर निचली अदालत से 15 दिन का समय मांगकर कार्रवाई रोके जाने संबंधी आवेदन दिया। वादी के अधिवक्ता योगेंद्र नारायण और अमरेंद्र विक्रम सिंह ने बुधवार को सीजेएम कोर्ट में कहा कि आरोपी आनंद अग्रवाल के खिलाफ जमानती वारंट तामील है, इसके बावजूद वह हाजिर नहीं हुआ। ऐसे में आरोपी के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया जाए। सीजेएम ने सुनवाई के बाद अधिवक्ताओें का अनुरोध स्वीकार कर आनंद अग्रवाल के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया।
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 हाईकोर्ट ने बीएचयू के प्रोफेसर की विधवा सरोज सिंह और उनके पिता की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। दोनों पर धोखाधड़ी कर जमीन हड़पने का आरोप है। याचिका पर न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रेखा दीक्षित ने सुनवाई की। याची के अधिवक्ता जितेंद्र सरीन का कहना था कि याची के खिलाफ 25 फरवरी 2016 को राजेंद्र मिश्र ने प्राथमिकी दर्ज कराई कि  जनसा वाराणसी में उसकी पैतृक भूमि है, जिसे उसने ज्ञान दत्त त्रिपाठी को बटाई पर खेती करने के लिए दिया था। याची ने वर्ष 2012 में फर्जी तरीके से दूसरे आदमी को खड़ा कर उस भूमि का बैनामा करा लिया। बैनामे की जानकारी उसे चार साल बाद मिली। ज्ञानदत्त को प्राथमिकी में अभियुक्त भी नहीं बनाया गया है। कोर्ट ने प्राथमिकी चार वर्ष के विलंब से दाखिल करने के आधार पर गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए याचिका निस्तारित कर दी।
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