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बनारसी अंदाजः कोई जीते कोई हारे, सब मिल बोलेंगे जोगीरा सररर...

Tue, 14 Mar 2017 05:51 PM IST
अनूप ओझा,अमर उजाला,वाराणसी
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सब मिल बोलेंगे जोगीरा सररर... - फोटो : अमर उजाला
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विधान सभा चुनाव के नतीजे आने के बाद किसी के चेहरे का रंग उड़ गया है तो किसी के चेहरे पर चढ़ गया है।  पिचकारी के रंगों से सराबोर होने से पहले विजय की होली मनाने के लिए सब तैयार हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में इस बार की चुनावी जीत की सियासी होली काफी शानदार होने जा रही है। बनारस में भाजपा  लगभग सीट पर  आगे है।
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बनारस घराने के प्रख्यात ठुमरी गायक पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र भी इस फगुनहट की बयार में होरी, फाग, चैती, चैता, घाटों की बंदिशों पर आलाप ले रहे हैं। वह कहते हैं कि जीत-हार किसी की हो, होली का रंग सभी के चेहरे पर चढ़ना चाहिए। काशी भेदभाव से परे बाबा विश्वनाथ की नगरी है। कोई जीते...अररर...सररर जोगीरा के बोल गूंजेंगे। भांग-ठंडई की तरंग पर रंग बरसेगा। सब हिलमिल होरी गाएंगे...।  

 गैबी की संकरी गली में अपने साधना कक्ष में स्वरपेटी के तारों को मिलाते हुए पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र कहते हैं कि ‘हो-ली’ यानी पाप का नाश हो जाना। भक्त प्रह्लाद को मारने की इच्छा से गोद में लेकर बैठी होलिका का जलकर राख हो जाना। वह राग मिश्र काफी में होरी गुनगुनाते हैं- होली खेलत नंद कुमार...। रंग डारूंगी नंद के लालन पे रंग डारूंगी/ सांवर रंग लाल कर दूंगी/ मलि गुलाल दोउ गालन पे...।
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वह करीब 30-40 वर्ष के होली के रंगों को याद करते हैं, जब बादाम, काजू, पिस्ता मिलाकर घाटों से लेकर मंदिरों तक भांग घोंटी जाती थी। बाबा का नाम लेकर लोग भांग छानते थे और हुड़दंग होता था। वह तुलसी घाट पर अपने कुछ मित्रों के साथ भांग छानते थे। चौसट्ठी माता को सबसे पहले अबीर लगाया जाता था और लोग सबसे गले मिलते एक-दूसरे के घर जाते थे। सबसे खराब तब लगता था जब हुड़दंगी मुंह में अलकतरा (तारकोल) पोत देते थे।

तीन -चार दिन छुड़ाने में लग जाता था। गुब्बारा में रंग भरकर छतों से फेंका जाता था। हुल्लड़बाजी खूब थी। गोदी में उठाकर लोग रंग भरे हौदा में डुबो देते थे। कपड़ा फड़ौव्वल भी खूब होता था। फिर कहते थे-बुरा न मानो होली है।

पंडित जी बताते हैं कि वह होली पर हर साल शहनाई के जादूगर बिस्मिल्लाह खां को रंग लगाकर गले मिलते थे। उस्ताद कहते थे-होली सबकी है। उस्ताद शहनाई बजाते थे। तबले पर किशन महाराज, सारंगी पर गोपाल महाराज होते थे। अनूठे सुर-ताल में होली गाई जाती थी। दरबारी महफिलें सजती थीं। गिरजा देवी, सिद्धेश्वरी, हरिशंकर महाराज होरी धमार गाते थे। गुजरिया गोरी खेलत होरी...।

इस बंदिश पर कभी मैं बोल बनाता था तो कभी उस्ताद। ठलुआ क्लब में चैती सम्मेलन में कलाकारों का जमावड़ा लगता था। राग दीपचंदी में वह होरी गाते हैं- आए खेलन होरी संग लिए ब्रज गोरी...। बात जब काशी की हो तो उनकी मसाने वाली मशहूर होरी के बिना पूरी नहीं होती।
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ब्रज से लेकर काशी तक की होरी में वह अंत में चहका ताल पर गाते हैं- खेलैं मसाने में होरी दिगंबर खेलैं मसाने में होरी/भूत पिशाच बटोरी...। 
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