काशी के कुछ तीर्थ अजीब मान्यताओं के लिए विख्यात हैं। इन्हीं में से एक है लोलार्क कुंड। मान्यता है कि अगर किसी को संतान न हो रही हो तो भादो शुक्ल पक्ष की षष्ठी को इस कुंड में गोता लगाने से नि:संतान दंपती की मनोकामना पूरी हो जाती है।
वैज्ञानिक दृष्टि से इसे भले अंधविश्वास कहा जाए लेकिन काशी के इस कुंड में संतान प्राप्ति के लिए डुबकी लगाने लाखों दंपतियों का रेला उमड़ता है। अब रखरखाव के अभाव में इस कुंड पर भी संकट की छाया मंडरा रही है। कुंड के पानी में काई की मोटी परत जमा हो गई है। कूड़ा, पॉलीथिन सड़ रहे हैं अलग से। आस्था के ऐसे प्रतीकों के संरक्षण पर अगर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाली पीढ़ी को पछताना पड़ सकता है।
लोलार्क कुंड सूखने के कगार पर है। हालांकि कुंड में कोई गंदगी न फैलाने पाए, इसके लिए उसकी सीढ़ियों पर चैनल लगाकर हमेशा ताला जड़ा रहता है। संस्कारों, रीति-रिवाजों से जुड़े इस कुंड पर स्नान, मुंडन या अन्य शुभ कार्यों के लिए जब श्रद्धालु पहुंचते हैं, तब कुंड़ की सीढ़ियों का ताला खोला जाता है। स्थानीय निवासी हृदय प्रकाश तिवारी बताते हैं कि कभी यह काशी का सबसे गंदा स्थल बन गया था।
दिन भर जुआरियों, नशेड़ियों की भीड़ रहती थी। अब तो बहुत गनीमत है। पर्यटन विभाग की मदद से सौंदर्यीकरण कराया गया लेकिन अभी बहुत काम करने की जरूरत है। गंगा का जलस्तर गिरने के साथ ही इस कुंड में पानी कम हो जाता है। बीते वर्ष षष्ठी के नहान पर नगर निगम को पंप लगवाकर पानी भरवाना पड़ था। इस कुंड के संरक्षण के लिए ठोस उपाय किए जाने चाहिए।