गंगा की सहायक एवं पौराणिक असि नदी की टैपिंग और उसे नाले के रूप में वर्गीकृत किए जाने के मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने बुधवार को कड़ा रुख अपनाया। एनजीटी ने सबसे पहले सवाल उठाया कि गंगा की सहायक असि नदी की टैपिंग की अनुमति राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने राज्य सरकार को किस आधार पर दी। न्यायाधिकरण ने पूछा कि असि नदी को नाले के रूप में वर्गीकृत किए जाने का आधार क्या है?
विज्ञापन
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के जवाब से असंतुष्ट एनजीटी ने मिशन के महानिदेशक को आगामी 13 अक्तूबर को तलब किया है। एनजीटी ने उनसे इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा है। याचिकाकर्ता सौरभ तिवारी की ओर से असि और वरुणा नदी के जीर्णोद्धार को लेकर दायर याचिका पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण की प्रधान पीठ, नई दिल्ली में सुनवाई हुई।
मामले की सुनवाई चेयरपर्सन न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव एवं विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान चेयरपर्सन न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि गंगा नदी प्राधिकरण आदेश, 2016 के प्रावधानों के अनुसार असि नदी गंगा नदी का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि असि नदी की टैपिंग सीधे तौर पर नदी की प्राकृतिक धारा में हस्तक्षेप है और यह सर्वोच्च न्यायालय के कमलनाथ मामले में दिए गए निर्णय की भावना के विपरीत है।
वहीं, विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद ने सुनवाई के दौरान कहा कि असि और वरुणा जैसी पौराणिक नदियों के नाम पर ही वाराणसी शहर का नाम पड़ा है। ऐसी स्थिति में असि नदी के साथ इस प्रकार का व्यवहार कैसे किया जा सकता है? मामले की सुनवाई के दौरान एनएमसीजी की ओर से अधिवक्ता ने पक्ष रखते हुए बताया कि अस्थायी रूप से टैपिंग इसलिए की गई, ताकि गंगा नदी में अपशिष्ट जल न जाए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के अनुरोध पर टैपिंग की अनुमति दी गई थी। इस पर एनजीटी ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि भविष्य में कोई गंगा नदी की टैपिंग की अनुमति मांगेगा, तो क्या उसे भी अनुमति दे दी जाएगी?
टैपिंग की कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं, यह गंभीर विषय
न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि अनुमति देते समय टैपिंग की कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई, जो गंभीर विषय है। एनजीटी ने अपने मौखिक आदेश में गंगा नदी (पुनरुद्धार, संरक्षण और प्रबंधन) प्राधिकरण आदेश, 2016 की धारा 4 एवं 5 का विस्तृत उल्लेख किया। न्यायाधिकरण ने कहा कि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 के तहत जारी यह आदेश 7 अक्तूबर 2016 से प्रभावी है। इसके अनुसार गंगा एवं उसकी सहायक नदियों तथा उनके बाढ़ क्षेत्र में किसी भी प्रकार के स्थायी अथवा अस्थायी निर्माण और प्राकृतिक धारा में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ प्रतिबंधित है।
एनजीटी ने एनएमसीजी से विस्तृत जवाब मांगा था
याचिकाकर्ता सौरभ तिवारी ने बताया कि बीते 5 फरवरी को हुई पिछली सुनवाई में भी एनजीटी ने असि नदी की टैपिंग और उसे नाले के रूप में वर्गीकृत किए जाने पर गंभीर आपत्ति जताई थी। उस समय उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कहा गया था कि असि नदी की टैपिंग की अनुमति राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने दी है। इसके बाद एनजीटी ने एनएमसीजी से विस्तृत जवाब मांगा था। बुधवार को दायर जवाब से संतुष्ट न होने पर न्यायाधिकरण ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक को 13 अक्तूबर को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया। अब मामले की अगली सुनवाई 13 अक्तूबर को होगी।