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Varanasi News: टेंट सिटी कंपनी से तीन महीने में वसूलें 34.24 लाख रुपये का जुर्माना, NGT ने कही ये बात; जानें

Sun, 11 Jan 2026 06:40 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Tent City Varanasi: एनजीटी ने अपने आदेश में कहा कि गंगा के नदी तल और फ्लड प्लेन को निर्माण मुक्त रखने के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद यहां व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की गईं, जो गंगा संरक्षण 2016 आदेश का उल्लंघन है।
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टेंट सिटी। - फोटो : अमर उजाला
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Varanasi News: अस्सी घाट के सामने गंगा की तलहटी में बसाई गई टेंट सिटी को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने अवैध करार दिया है। एनजीटी ने अपने निर्णय में कहा कि नदी के तट और बाढ़ क्षेत्र में टेंट सिटी का निर्माण और संचालन पर्यावरणीय नियमों, गंगा संरक्षण कानूनों और ट्रिब्यूनल के पूर्व आदेशों का खुला उल्लंघन था। एनजीटी ने यह भी कहा कि भविष्य में गंगा के तट पर किसी भी प्रकार की टेंट सिटी बसाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

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ट्रिब्यूनल ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग को निर्देश दिया है कि दोनों टेंट सिटी संचालकों से लगाई गई 34.24 लाख रुपये की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति तीन माह के भीतर वसूली जाए। यह आदेश एनजीटी की प्रधान पीठ नई दिल्ली ने तुषार गोस्वामी बनाम भारत संघ व अन्य में पारित किया। मामले की सुनवाई 12 दिसंबर 2025 को पूरी हुई थी, जबकि फैसला 8 जनवरी 2026 को सुनाया गया। 

एनजीटी ने अपने आदेश में साफ कहा है कि भविष्य में गंगा नदी या उसकी सहायक नदियों के तट पर पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन कर कोई भी टेंट सिटी या इसी तरह की पर्यटन परियोजना स्थापित नहीं की जाएगी। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि काशी में विकास आवश्यक है, लेकिन गंगा की अविरलता, निर्मलता और जैव विविधता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

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अस्सी घाट के सामने गंगा के नदी तल पर खड़ी कर दी गई थीं टेंट सिटी
अस्सी घाट के सामने गंगा नदी के दाहिने तट और नदी तल पर दो निजी कंपनियों प्रवेज कम्युनिकेशंस (इंडिया) लिमिटेड और निरान टेंट सिटी को पर्यटन उद्देश्य से टेंट सिटी विकसित करने की अनुमति दी गई थी। यह टेंट सिटी जनवरी 2023 से मई 2023 तक संचालित रहीं। टेंट सिटी के लिए भूमि वाराणसी विकास प्राधिकरण (वीडीए) के माध्यम से दी गई थी। 

संयुक्त समिति की रिपोर्ट में गंभीर पर्यावरणीय उल्लंघन
एनजीटी के आदेश पर गठित सात सदस्यीय संयुक्त समिति ने स्थल निरीक्षण के बाद गंभीर उल्लंघनों की पुष्टि की। समिति ने पाया कि दोनों टेंट सिटी बिना अनुमति के संचालित की जा रही थीं। गंगा के नदी तल पर ईंट से बने स्थायी सीवेज चैंबर बनाए गए थे, जिनमें नीचे कोई अभेद्य लाइनिंग नहीं थी। इससे गंदे पानी के रिसाव और नदी प्रदूषण का खतरा बना रहा। समिति ने इन चैंबरों को नदी तल पर बने सोक पिट जैसा बताया।

इसके अलावा गंगा के मुख्य प्रवाह में अस्थायी जेटी बनाई गई, मोटर बोट्स का संचालन हुआ और डीजल जनरेटर सेट निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए। यह स्थिति गंगा की जल गुणवत्ता और जलीय जीवों के लिए गंभीर खतरा मानी गई। समिति में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन, पर्यावरण मंत्रालय, केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, सिंचाई विभाग और जिलाधिकारी वाराणसी शामिल थे।

कछुआ संरक्षण क्षेत्र को लेकर भी उठे सवाल
संयुक्त समिति की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि जिस क्षेत्र में टेंट सिटी स्थापित की गई, वह पहले कछुआ (टर्टल) वन्यजीव अभयारण्य के अंतर्गत था। कछुआ अभयारण्य के डि-नोटिफिकेशन का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के कारण एनजीटी ने इस मुद्दे पर अंतिम टिप्पणी करने से परहेज किया, लेकिन इसे गंभीर पर्यावरणीय विषय बताया।

वीडीए और प्रशासन की भूमिका पर सवाल
एनजीटी ने अपने आदेश में यह भी दर्ज किया कि टेंट सिटी के लिए वाराणसी विकास प्राधिकरण ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन से पूर्व अनुमति नहीं ली थी। इसे गंभीर प्रशासनिक चूक माना गया है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते निगरानी और नियमों का पालन कराया गया होता, तो गंगा के नदी तल पर इस तरह का निर्माण नहीं होता।
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पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति तय, लेकिन अब तक वसूली नहीं
यूपीपीसीबी ने दोनों टेंट सिटी संचालकों पर जनवरी से मई 2023 के बीच बिना अनुमति संचालन के लिए 17.12 लाख रुपये प्रति कंपनी की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई थी। हालांकि, एनजीटी ने नाराजगी जताते हुए कहा कि अब तक यह राशि वसूल नहीं की जा सकी है। ट्रिब्यूनल ने यूपीपीसीबी और राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि तीन महीने के भीतर वसूली सुनिश्चित की जाए।
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