नौकरशाहों पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) का भी खौफ नहीं है। हाल ही में गंगा से जुड़ी अधिकरण को दी गई रिपोर्ट गुमराह करने वाली है। अफसरों ने जानकारी दी कि बनारस में 23 नालों का गंदा पानी गंगा में सीधे गिरता है जबकि हकीकत में आंकड़ा कुछ और ही है। अमर उजाला ने सोमवार को जब इस मुद्दे पर खोजबीन की तो पता चला कि छोटे बड़े 37 नालों का लगभग सौ एमएलडी सीवर गंगा में गिर रहा है। एनजीटी की कौन कहे नौकरशाह प्रधानमंत्री के नमामि गंगे योजना को पलीता लगा रहे हैं।
ताज्जुब है कि एनजीटी के दिशा निर्देशों का कहीं भी पालन नहीं हो रहा है। उद्गम स्थल गंगोत्री से लेकर उसके बंगाल की खाड़ी में समाहित होने तक यही हाल है। गंगा में गिर रहे नालों को रोकने के लिए एनजीटी ने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को अनिवार्य किया है मगर अधिकारियों की लापरवाही का नतीजा है कि आज तक कहीं भी एसटीपी का निर्माण पूरा नहीं हो सका है।
गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई, जल निगम, सेतु निगम आदि ऐसी संस्थाएं हैं जो सीधे गंगा से जुड़ी हैं। मगर ये संस्थाएं भी नमामि गंगे योजना में अपनी सही भूमिका अब तक नहीं निभा सकी हैं। सात साल से शहर में सीवर और पेयजल की नई पाइप लाइन बिछाने का काम चल रहा है मगर यह काम कब पूरा होगा, किसी को नहीं मालूम। एसटीपी का कार्य भी आज तक अधर में है। जिम्मेदार संस्थाएं इस बारे में कोई साफ जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं। नदी वैज्ञानिकों का कहना है कि जब तक इन नालों को गंगा में गिरने से रोका नहीं जाएगा, अविरल और निर्मल गंगा की बात बेमानी होगी।
गंगा को अविरल और निर्मल बनाने के लिए केंद्र सरकार ने अलग से मंत्रालय बना रखा है। नमामि गंगे योजना के तहत ढेरों कार्ययोजनाएं बनी हैं मगर काम की रफ्तार बेहद धीमी है। काशी में अस्सी से राजघाट के बीच गंगा सर्वाधिक प्रदूषित है। वजह है इस दायरे में गिरने वाले चार-पांच बड़े नाले। इसके अलावा असि और वरुणा का गंदा पानी भी गंगा में मिल रहा है।
नदी वैज्ञानिक प्रो. यूके चौधरी का कहना है कि असि और वरुणा ये दोनों नदियां गंगा को रिचार्ज करती थीं मगर जब से इन दोनों के अस्तित्व पर संकट आया, गंगा की अविरलता और निर्मलता भी प्रभावित हुई। उनका साफ कहना है कि गंगा को नया जीवन देने के लिए वरुणा और असि नदी को पुनर्जीवित करना ही होगा। यह काम किए बगैर गंगा के निर्मलीकरण की योजना परवान नहीं चढ़ पाएगी।