ऑटो चालक ने दिया नशीला पदार्थ, सड़क पर मिले अचेत
दर्शन के बाद लौटते समय एक ऑटो चालक ने कथित तौर पर निरंजन को नशीला पदार्थ खिलाकर बैग व मोबाइल लूट ली। इसके बाद वह दारानगर इलाके में अचेत अवस्था में पाए गए। जब उन्हें होश आया तो उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ चुकी थी। वह ठीक से बोल भी नहीं पा रहे थे। सदमे और मानसिक तनाव में डूबे निरंजन महामृत्युंजय मंदिर की चौखट पर घंटों गुमसुम बैठे रहे।
उधर, राह चलते लोग उन्हें देखते रहे, लेकिन किसी ने उनकी हालत को समझने की कोशिश नहीं की। तभी असहाय और लावारिस लोगों की मदद करने वाले समाजसेवी अमन कबीर की नजर उन पर पड़ी। उन्होंने निरंजन से बात करने की कोशिश की, लेकिन वह स्पष्ट जवाब देने की स्थिति में नहीं थे।
भाई से मिलते ही छलक पड़े आंसू
जब चित्र पांडेय आश्रम पहुंचे और उन्होंने अपने छोटे भाई को देखा तो खुद को रोक नहीं सके। दोनों भाई एक-दूसरे से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़े। कुछ देर बाद जब माहौल सामान्य हुआ तो चित्र पांडेय ने अमन कबीर का हाथ पकड़कर उनका आभार जताया। उन्होंने कहा कि नेपाल हमेशा से भारत का छोटा भाई रहा है, लेकिन आज इस रिश्ते पर सच्ची मुहर लग गई। जिस तरह से अमन कबीर ने उनके छोटे भाई की देखभाल की, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
टूट गया जापान जाने का सपना
चित्र पांडेय ने बताया कि उनके पिता मोहनराज पांडेय काठमांडू में शिक्षक थे और अब रिटायर हो चुके हैं। मां गृहणी हैं। परिवार में सबसे बड़े चित्र खुद बेंगलुरु की एक मेडिकल कंपनी में काम करते हैं, जबकि छोटा भाई निरंजन अपने करियर की सबसे बड़ी शुरुआत करने जा रहा था। 14 मई को जापान की कंपनी में उसका इंटरव्यू था, लेकिन इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने उसके करियर पर अचानक ब्रेक लगा दिया। हालांकि परिवार इस बात से राहत में है कि वह सुरक्षित मिल गया और बाबा विश्वनाथ की नगरी तथा बुद्ध की तपोस्थली में उसे इंसानियत का सहारा मिला।
काशी से नेपाल तक साथ गई इंसानियत की कहानी
गुरुवार को चित्र पांडेय अपने भाई के साथ सारनाथ घूमने गए। इसके बाद दोनों नेपाल के लिए रवाना हो गए। जाते-जाते चित्र पांडेय ने अमन कबीर को ढेरों शुभकामनाएं दीं और कहा कि जिंदगी में ऐसे लोग ही उम्मीद को जिंदा रखते हैं। यह कहानी सिर्फ एक युवक के टूटे सपने की नहीं है। यह उस दौर की तस्वीर भी है जहां एक तरफ इंसान चंद पैसों के लिए किसी की जिंदगी तबाह कर देता है, तो दूसरी तरफ कोई अनजान व्यक्ति बिना किसी रिश्ते के किसी की जिंदगी संभालने में जुट जाता है। सवाल यही है कि आखिर समाज की असली पहचान किससे बनती है — धोखे से या इंसानियत से?