फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

नवरात्रि 2021: अष्टमी और नवमी में पूजी जाती हैं कन्याएं, बनी रहती है मां अन्नपूर्णा व महालक्ष्मी की कृपा

Wed, 14 Apr 2021 11:07 AM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
विज्ञापन
कन्या पूजन (सांकेतिक)। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

शास्त्रों में नवरात्रि के अवसर पर कन्या पूजन या कन्या भोज को अत्यंत ही महत्वपूर्ण बताया गया है। नवरात्रि में देवी मां के सभी साधक कन्याओं को मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप मानकर उनकी पूजा करते हैं। अष्टमी और नवमी तिथि पर कन्याओं की पूजा और भोज करवाने से देवी अन्नपूर्णा के साथ महालक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त होती है।

विज्ञापन


काशी विद्वत परिषद के मंत्री डॉ. रामनारायण द्विवेदी के अनुसार नवरात्र में हर दिन देवी की पूजा व्रत-उपवास और कन्या भोज करवाया जाता है। लेकिन व्यस्तता और आर्थिक स्थिति की वजह से कुछ लोगों के लिए ये संभव नहीं हो पाता है। मार्कंडेय पुराण के मुताबिक नवरात्र की अष्टमी और नवमी तिथि पर देवी की महापूजा का विधान है। महापूजा के इन दो दिनों में ही पूरे नवरात्र का फल मिल सकता है।

ज्योतिषाचार्य पं.गणेश प्रसाद मिश्र ने बताया कि भविष्यपुराण और देवीभागवत पुराण में कन्या पूजन का वर्णन किया गया है। इस वर्णन के अनुसार नवरात्रि का पर्व कन्या भोज के बिना अधूरा है। लोग कन्या पूजा नवरात्रि पर्व के किसी भी दिन या कभी भी कर सकते हैं। लेकिन पौराणिक कथाओं के अनुसारए नवरात्रि के अंतिम दो दिनों अष्टमी और नवमीं को कन्या पूजन का श्रेष्ठ दिन माना गया है।

विज्ञापन
विज्ञापन

नौ कन्याओं को कराते हैं भोज
ज्योतिषाचार्य राहुल मिश्र के अनुसार कन्या पूजन के लिए दो से 10 वर्ष की कन्याओं को बहुत ही शुभ माना गया है। कथाओं में कहा गया है कि कन्या भोज के लिए आदर्श संख्या नौ होती है। वैसे लोग अपनी श्रद्धा अनुसार कम और ज्यादा कन्याओं को भी भोजन करा सकते हैं। पं. गणेश का कहना है कि दो वर्ष की कन्या को कन्या कुमारी, तीन साल की कन्या को त्रिमूर्ति, चार साल की कन्या को कल्याणी, पांच साल की कन्या को रोहिणी, छह साल की कन्या को कालिका, सात साल की कन्या को चंडिका, आठ साल की कन्या को शांभवी, नौ साल की कन्या को दुर्गा और 10 साल की कन्या को सुभद्रा का स्वरूप माना जाता है। यही कारण है कि कन्या भोज या कन्या पूजन के लिए 10 साल से कम उम्र की बालिकाओं को ही महत्वपूर्ण माना जाता है।

पूजा विधि
प्रात: काल स्नान करके प्रसाद में खीर, पूड़ी और हलवा आदि तैयार करना चाहिए। इसके बाद कन्याओं को बुलाकर शुद्ध जल से उनके पांव धोने चाहिए। कन्याओं के पांव धुलने के बाद उन्हें साफ आसन पर बैठाना चाहिए। कन्याओं को भोजन परोसने से पहले मां दुर्गा का भोग लगाना चाहिए और फिर इसके बाद प्रसाद स्वरूप में कन्याओं को उसे खिलाना चाहिए। नौ कन्याओं के एक साथ एक छोटे बालक को भी भोज कराने का प्रचलन है। बालक भैरव बाबा का स्वरूप या लंगूर कहा जाता है। कन्याओं को भरपेट भोजन कराने के बाद उन्हें टीका लगाएं और कलाई पर रक्षा बांधें। कन्याओं को विदा करते वक्त अनाज, रुपया या वस्त्र भेंट करें और उनके पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करें।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें