फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राष्ट्रीय संस्कृत पुस्तक मेले का समापन, नहीं टूटा ‘राग दरबारी’ का तिलिस्म

Mon, 18 Sep 2017 05:30 PM IST
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
विज्ञापन
राष्ट्रीय संस्कृत पुस्तक मेले के अंतिम दिन भी उमड़ी खरीदारों की भीड़ - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
करीब 50 साल पहले लिखे गए श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ का तिलिस्म अब भी बरकरार है। इतना लंबा समय बीतने के बाद इंटरनेट के युग में भी ‘राग दरबारी’ हिंदी साहित्य के पाठकों के पसंदीदा उपन्यासों में शुमार है।
विज्ञापन


वाराणसी के टाउनहॉल मैदान में आयोजित राष्ट्रीय संस्कृत पुस्तक मेले में सबसे ज्यादा इस उपन्यास की मांग हुई। डॉ. अब्दुल कलाम और मुंशी प्रेमचंद की कृतियां भी खूब पसंद की गईं। 
नौ सितंबर से चल रहे राष्ट्रीय संस्कृत पुस्तक मेले का रविवार को समापन हो गया। अंतिम दिन मेले में खरीदारों की खासी भीड़ रही। पुस्तक मेले में ‘राग दरबारी’ ऑल टाइम फेवरेट साबित हुई। वहीं, प्रेमचंद की ‘गोदान’, ‘निर्मला’ को भी पुस्तक प्रेमियों ने हाथों हाथ लिया।
विज्ञापन
    इनसे अलग नेशनल बुक ट्रस्ट के स्टाल पर डॉ. नंद किशोर और नम्रता की लिखी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी व पं. दीनदयाल उपाध्याय की पुस्तकों के प्रति लोगाें का रुझान देखने को मिला। मार्केटिंग मैनेजर पद्म सिंह ने बताया मेले में सबसे ज्यादा हिंदी के पाठक आए।   हिंदी और अंग्रेजी की पुस्तकों की बिक्री का अनुपात करीब 70 और 30 फीसदी का रहा। साउथ इंडिया टेंपल व नार्थ इंडिया टेंपल किताबें भी पसंद की गई। 
एपीजे अब्दुल कलाम के प्रति युवाओं का खासा रुझान रहा। उनकी किताबें ‘अग्नि की उड़ान’ और ‘आपका भविष्य आपके हाथ’ भी खूब बिकीं। साहित्य से इतर तारिक फतेह की पुस्तक ‘द ट्रैजिक इल्युजन ऑफ एन इस्लामिक स्टेट’ की भी ठीक-ठाक बिक्री हुई। अमीश त्रिपाठी की शिवा ट्रायोलॉजी भी युवाओं ने पसंद की तो जीएसटी पर आई पुस्तक का स्टॉक भी खत्म हो गया। विवेक बुक पब्लिकेशन के विवेक ने बताया कि साहित्य, दर्शन और क्लासिक पुस्तकों के पाठकों की खासी तादाद रही, जो अच्छी बात है। 
विज्ञापन

‘संस्कृत’ के चलते पुस्तक मेला का बाजार रहा ठंडा

राष्ट्रीय संस्कृत पुस्तक मेले में छात्राएं - फोटो : अमर उजाला
पुस्तक मेले में बाहर से आए कई प्रकाशकों को मायूसी हाथ लगी। प्रकाशकों ने बताया कि अपेक्षा से काफी कम व्यवसाय हुआ। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि पुस्तकों के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है, बल्कि इस मेले में ‘संस्कृत’ शब्द जुड़ने की वजह से बाकी पाठक कम आए। 

राजकमल प्रकाशन के एक सदस्य का कहना था कि इससे पहले पुस्तक मेलों में हमें बेहतर परिणाम मिले थे। इस बार ‘संस्कृत पुस्तक मेला’ के नाम की वजह से भीड़ उतनी नहीं आई। अंजुमन पब्लिकेशन के वीनस केसरी ने बताया कि मेले का अच्छा रिस्पांस नहीं मिला।

हम अपनी लागत तक नहीं निकाल पाए। रीड पब्लिकेशन के दिनेश कुशवाहा का कहना था इसका प्रचार-प्रसार सही ढंग से नहीं किया गया। लोगों को यह पता नहीं चला कि यहां हिंदी और अंग्रेजी की भी किताबें हैं।

राजपाल प्रकाशन के अशोक शुक्ला ने बताया इस बार 50 फीसदी से भी कम बिक्री हुई। उधर, संस्कृत साहित्य के स्टॉल लगाने वाले भी मायूस थे। शारदा संस्कृत संस्थान, एकेडमी ऑफ संस्कृत रिसर्च कर्नाटक और राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान इलाहाबाद के स्टॉल भीड़ नहीं खींच सके। 

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की ओर से राष्ट्रीय पुस्तक मेला प्रेक्षागृह में रविवार को ‘संस्कृत विद्या के संवर्धन में कलामूलशास्त्र का योगदान’ पर बौद्धिक परिचर्चा आयोजित की गई। इसमें संगीत शास्त्र के विद्वान प्रो. ऋत्विक सान्याल ने संगीत के लिए प्रयोग पक्ष के साथ शास्त्रीय पक्ष की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें